<?xml version='1.0' encoding='UTF-8'?><?xml-stylesheet href="http://www.blogger.com/styles/atom.css" type="text/css"?><feed xmlns='http://www.w3.org/2005/Atom' xmlns:openSearch='http://a9.com/-/spec/opensearchrss/1.0/' xmlns:georss='http://www.georss.org/georss' xmlns:gd='http://schemas.google.com/g/2005' xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'><id>tag:blogger.com,1999:blog-5621615689103488557</id><updated>2011-10-05T00:56:25.481+05:30</updated><title type='text'>DEVBHUMI   UTTARANCHAL</title><subtitle type='html'></subtitle><link rel='http://schemas.google.com/g/2005#feed' type='application/atom+xml' href='http://butolavijay.blogspot.com/feeds/posts/default'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5621615689103488557/posts/default?max-results=100'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://butolavijay.blogspot.com/'/><link rel='hub' href='http://pubsubhubbub.appspot.com/'/><author><name>Vijay Singh Butola</name><uri>http://www.blogger.com/profile/10701971246743120104</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='31' height='32' src='http://3.bp.blogspot.com/_HvC2cLQkeYw/SXla3t65CLI/AAAAAAAAAEw/luftISiSRhs/S220/Copy+of+000_0903.jpg'/></author><generator version='7.00' uri='http://www.blogger.com'>Blogger</generator><openSearch:totalResults>11</openSearch:totalResults><openSearch:startIndex>1</openSearch:startIndex><openSearch:itemsPerPage>100</openSearch:itemsPerPage><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5621615689103488557.post-5743580398106386381</id><published>2009-04-04T12:30:00.000+05:30</published><updated>2009-04-04T12:32:11.871+05:30</updated><title type='text'>मेरु क्या कसूर छा (बेटी की पीड़ा)</title><content type='html'>&lt;strong&gt;मेरु क्या कसूर छा&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;रीति अर रिवाजो का नाम पर &lt;br /&gt;कुजाणी कब तल्क मिटणु रौलू मैं &lt;br /&gt;आंख्यो का आंसू पोंछी कें&lt;br /&gt;मैं पूछी अपणी माँ थैं&lt;br /&gt;किले दिनी त्वैन मैं बेटी कु जन्म&lt;br /&gt;बोल मेरी माँजी मेरु क्या कसूर छा&lt;br /&gt;जू मिली मैथै बेटी कु जन्म&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;क्या दर्द अर पीड़ा बनी कें रलू यो मेरु जीवन &lt;br /&gt;तेरी कोख मा ही नोऊ मैना पली चौं मैं  &lt;br /&gt;ऐकें ईं धरती मा मैं भी त्वै सुख देलु &lt;br /&gt;माना कि ह्वौ जौलू मैं विराणी पर त्वै न बिसरौलू  &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तू ही छा जू मेरी पीड़ा समज्दी&lt;br /&gt;तिरस्कार भी झेली व झेली अपमान भी &lt;br /&gt;फिर भी दिनी त्वैन जन्म मैकै सारी सब पीड़ा   &lt;br /&gt;वचन छा मेरु देलु सब सुख त्वै &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हे मानव बेटियौं कें न समझा अभिशाप &lt;br /&gt;औंण दयवा हम्कैं भी इन दुनिया मा &lt;br /&gt;हमारू भी आस्तित्व रण दियवा   &lt;br /&gt;बेटियौं कें भी अपणु प्यार दियवा&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5621615689103488557-5743580398106386381?l=butolavijay.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://butolavijay.blogspot.com/feeds/5743580398106386381/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=5621615689103488557&amp;postID=5743580398106386381' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5621615689103488557/posts/default/5743580398106386381'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5621615689103488557/posts/default/5743580398106386381'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://butolavijay.blogspot.com/2009/04/blog-post.html' title='मेरु क्या कसूर छा (बेटी की पीड़ा)'/><author><name>Vijay Singh Butola</name><uri>http://www.blogger.com/profile/10701971246743120104</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='31' height='32' src='http://3.bp.blogspot.com/_HvC2cLQkeYw/SXla3t65CLI/AAAAAAAAAEw/luftISiSRhs/S220/Copy+of+000_0903.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5621615689103488557.post-3773882012470261260</id><published>2009-03-04T11:48:00.000+05:30</published><updated>2009-03-04T11:50:57.486+05:30</updated><title type='text'></title><content type='html'>प्रिय मित्रो,&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अभी अभी मैंने एक और कविता की रचना की है, जिसमे मैंने अपने कवि मन की व्यथा को पहाड़ से हमारे पलायन के प्रभाव के रूप में प्रस्तुत किया है | आशा है आप को पसंद आयेगी ?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;प्रस्तुत है मेरी कविता जिसका शीर्षक है ---------------है धरा तुम्हे पुकार रही |&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;है धरा पुकार रही&lt;/strong&gt; &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जन्मभूमि निरंतर तुम्हे तुम्हारी है रही पुकार&lt;br /&gt;सूने पड़े है खेत-खलिहान खली है गौं-गुठियार&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हैं निर्जन वो गलियाँ जंहा पथिको को थी कभी भरमार&lt;br /&gt;राहें जाग रही है बाट जोहे है उन्हें पदचिन्हों का इंतजार &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;गिने चुने जन ही शेष है सन्नाटा पसरा हुआ है चहूँ और &lt;br /&gt;ताक रही है धरती ऐसे मानो की जैसे रुग्ण व्यक्ति ताके भोर &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अविरल बहते नदी-नाले भी मुड़ गए अनजान राहों पर &lt;br /&gt;जंगल-पहाड़ भी मौन खड़े है आँखे उनकी भी हैं तर &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;खेतों-खलिहानों में भी अब बाँझपन कर चूका है घर &lt;br /&gt;ये इनके वक्षो पर नमी नहीं है ये अशरुओ से तर-तर &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;फूलो ने भी महकना छोड़ा साथ ही फलों के वृक्ष भी हुए बाँझ &lt;br /&gt;ये धरती भी करती है प्रतीक्षा तुम्हारे आने की प्रात: हो या साँझ &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;घुघूती भी अब नहीं बासती आम की डालियों पर &lt;br /&gt;कलरव छोड़ा चिडियों ने जैसे ग्रहण लगा हो इस धरा पर &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जंगल और पहाड़ की आँखे लगी है उन राहों पर &lt;br /&gt;घसेरियां जहा खुदेड़ गीत लगा याद करती थी अपना प्रियवर &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;चैत महीने के कोथिगो व् मेलों की न रही वो पहिचान &lt;br /&gt;धुल-धूसरित हुई संस्कृति खो गया कही लोककला का मान &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;काफल-बुरांस के पेड़ अब लाली नहीं फैलाते नहीं हो रहे प्रतीत &lt;br /&gt;सोचो तो जरा कभी क्योँ बिसराया हमने पहाड़ क्यों छोड़ी वो प्रीत &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हे शैलपुत्रो बुला रही है ये धरती तुम्हे आओ करो इसका पुन: श्रंगार &lt;br /&gt;चार दिन के इस जीवन में कभी तो समय निकालो दो इसको अपना प्यार &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ये जन्मभूमि हमारी माता है इसका हमसे अटूट नाता  है &lt;br /&gt;बिसरे तुम उसे जो तुम्हे बरबस बुलाये क्या ये तुमको भाता है ?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जगा इच्छाशक्ति, आओ लौट चले इसकी जीवनदायिनी गोद में यही तो हमारी माता है &lt;br /&gt;ले संकल्प करो सृजन इस धरा का अब कर्ज चुकाने का समय शुरू हो जाता है &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;Written By: Vijay Singh Butola &lt;br /&gt;Dated: 04-03-2009 @ 11:00&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5621615689103488557-3773882012470261260?l=butolavijay.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://butolavijay.blogspot.com/feeds/3773882012470261260/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=5621615689103488557&amp;postID=3773882012470261260' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5621615689103488557/posts/default/3773882012470261260'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5621615689103488557/posts/default/3773882012470261260'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://butolavijay.blogspot.com/2009/03/written-by-vijay-singh-butola-dated-04.html' title=''/><author><name>Vijay Singh Butola</name><uri>http://www.blogger.com/profile/10701971246743120104</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='31' height='32' src='http://3.bp.blogspot.com/_HvC2cLQkeYw/SXla3t65CLI/AAAAAAAAAEw/luftISiSRhs/S220/Copy+of+000_0903.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5621615689103488557.post-2096715803155722364</id><published>2009-01-16T10:36:00.008+05:30</published><updated>2009-01-20T14:28:13.480+05:30</updated><title type='text'>तीसरा कैरियर गाइडेंस कैम्प मानिला, अल्मोडा (उत्तराखंड)</title><content type='html'>&lt;span style="color:#009900;"&gt;&lt;strong&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;span style="color:#ff0000;"&gt;यंग उत्तराखंड द्वारा आयोजित तीसरा कैरियर गाइडेंस कैम्प मानिला, अल्मोडा (उत्तराखंड)&lt;/span&gt; &lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#009900;"&gt;&lt;strong&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#009900;"&gt;&lt;strong&gt;यंग उत्तराखंड&lt;/strong&gt; द्वारा &lt;strong&gt;दिनांक 12 जनवरी 2009&lt;/strong&gt; को&lt;/span&gt; &lt;em&gt;&lt;span style="color:#3333ff;"&gt;राजकीय इंटर कालेज मानिला , अल्मोडा (उत्तराखंड)&lt;/span&gt;&lt;/em&gt; &lt;span style="color:#009900;"&gt;में एक दिवसीय कैरियर गाइडेंस कैम्प का आयोजन किया गया यंग उत्तराखंड द्वारा आयोजित यह तीसरा कैरियर गाइडेंस कैम्प था इस कैम्प का मुख्य उद्देश्य कक्षा ग्यारहवी व बारहवी के विद्यार्थियों के स्कूली शिक्षा उतीर्ण करने के उपरान्त रोजगार प्राप्त करने व रोजगार के विभिन्न क्षेत्रो के बारे में जानकारी प्रदान करना था &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#3333ff;"&gt;दिनांक 10 जनवरी 2009 को यंग उत्तराखंड के सदस्यों की टीम दिल्ली से राजकीय इंटर कालेज मानिला, अल्मोडा के लिए रवाना हुई यंग उत्तराखंड की ओर से इस कैम्प में जाने वाले सदस्य इस प्रकार थे:&lt;/span&gt; (1) &lt;span style="color:#3366ff;"&gt;श्री पुर्नेंदु सिंह चौहान&lt;/span&gt; (2) &lt;span style="color:#009900;"&gt;श्री ज्योति संग&lt;/span&gt; (3) &lt;span style="color:#ff0000;"&gt;श्री विवेक पटवाल&lt;/span&gt; (4) &lt;span style="color:#cc33cc;"&gt;श्री विजय सिंह बुटोला&lt;/span&gt; (5) &lt;span style="color:#009900;"&gt;श्री नीरज बवाड़ी&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;blockquote&gt;&lt;/blockquote&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5291772947361287778" style="DISPLAY: block; MARGIN: 0px auto 10px; WIDTH: 400px; CURSOR: hand; HEIGHT: 300px; TEXT-ALIGN: center" alt="" src="http://1.bp.blogspot.com/_HvC2cLQkeYw/SXAndWd9zmI/AAAAAAAAAEc/EMwIrRfzfXQ/s400/5.jpg" border="0" /&gt; &lt;span style="color:#ff0000;"&gt;&lt;strong&gt;कैम्प लिए टीम का दिल्ली से प्रस्थान&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt; : &lt;span style="color:#cc33cc;"&gt;सबसे पहले कैम्प में जाने वाली गाड़ी ने श्री ज्योति संग व श्री नीरज बवाड़ी को फरीदाबाद से लिया और फिर रात 8।45 पर श्री पुर्नेंदु सिंह चौहान के घर पर उन्हें व श्री विजय बुटोला को लेने पहुची इंदिरापुरम से गाड़ी ने श्री विवेक पटवाल को लिया और इस प्रकार यंग उत्तराखंड के 5 सदस्यों की टीम मानिला के लिए रवाना हुई &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#ff0000;"&gt;&lt;strong&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;br /&gt;&lt;blockquote&gt;&lt;span style="color:#ff0000;"&gt;&lt;strong&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/blockquote&gt;टीम&lt;/span&gt; का उत्तराखंड में प्रवेश&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt; : &lt;span style="color:#009900;"&gt;अगले दिन (11-01-2009) रात तीन बजे हम रामनगर पहुचे जलपान आदि करने के बाद सभी सदस्य अपनी शेष यात्रा पुरी करने के लिए चल पड़े विश्व विख्यात जिम कोर्बेट वन्य जीव अभ्यारण से होते हुए हम प्रात: चार बजे मर्चुला पहुचे रास्ते में हम सभी जिम कोर्बेट वन्य जीव अभ्यारण के समीप स्तिथ माता गिरिजा देवी के दर्शनों के लिए गए किंतु मन्दिर के द्वार बंद होने की वजह से हम दर्शन नही कर सके और हमने यह निर्णय लिया की वापसी के समय हम दर्शन करने आएंगे &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color:#ff0000;"&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;br /&gt;&lt;blockquote&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color:#ff0000;"&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/blockquote&gt;टीम&lt;/span&gt; का मानिला में प्रवेश&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt; : &lt;span style="color:#ff6600;"&gt;मर्चुला से मौलेखाल, पिपोला, बांगीधर और डोटियाल होते हुए सुबह 6 बजे टीम मानिला में श्री नीरज बवाड़ी जी के घर पहुची श्री ज्योति संग जी के रहने व खाने की व्यस्था श्री नीरज बवाड़ी जी के घर पर थी श्री पुर्नेंदु चौहान व श्री विजय सिंह बुटोला के रहने व खाने की व्यस्था श्री विवेक पटवाल जी के घर पर थी बाकी सदस्य श्री विवेक पटवाल जी के घर सुबह 7 बजे पहुचे नित्य कर्म से निवृत हो कर हम सभी ने नाश्ता किया और फिर अगले दिन होने वाले कैम्प की तैयारियों में जुट गए &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color:#ff0000;"&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;br /&gt;&lt;blockquote&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color:#ff0000;"&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/blockquote&gt;टीम&lt;/span&gt; का मानिला में भ्रमण&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt; : &lt;span style="color:#009900;"&gt;टीम के सभी सदस्यों के दोपहर के भोजन की व्यस्था श्री नीरज बवाड़ी जी के घर पर ही थी हम दोपहर एक बजे श्री बवाड़ी जी के घर पहुचे और भोजन के उपरांत हम सभी मानिला देवी के शक्तिपीठ मल्ला मानिला पहुचे&lt;/span&gt; &lt;span style="color:#cc0000;"&gt;मल्ला मानिला के इस शक्तिपीठ के निर्माण से एक पौराणिक कथा जुड़ी हुई है&lt;/span&gt; &lt;span style="color:#3333ff;"&gt;कहा जाता है की एक समय कुछ चोर माता के मन्दिर से उनकी अष्ट धातु की प्रतिमा चुराने गए पूरी प्रतिमा तो वे नही चुरा पाए परन्तु देवी का एक हाथ वे चुरा कर ले गए बहुत दूर चलने के बाद वे थक गए जब वे विश्राम करके उठे तो वे देवी के उस हाथ को नही उठा सके ,तब तक भोर हो चुकी थी किसी को पता चलने के डर से वे उसे वही छोड़ कर भाग गए बाद में स्थानीय लोगो ने वह पर माता मानिला के मन्दिर की स्थापना की , आज यह शक्तिपीठ मल्ला मनीला के नाम से जाना जाता है माता मानिला का प्राचीन शक्तिपीठ तल्ला मनीला नामक गाँव में है जिसे तल्ला मानिला माता शक्तिपीठ के नाम से जाना जाता है यह मल्ला मानिला माता शक्तिपीठ से करीब 10 किलोमीटर दूर स्थित है देवदार, चीड बाँज व बुरांस के जंगलो के बीच यह मन्दिर वास्तव में अनुपम है अनेको बुगयालो के बीच यह शक्तिपीठ देख कर आत्मा को चिर आनंद की अनुभूति होती है तथा माता के दर्शन पा कर भक्तगण मन की शान्ति व आशीष पाने का अनुभव करते है &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;blockquote&gt;&lt;/blockquote&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;माता मानिला के दोनी शक्तिपीठो के दर्शन कर श्री चौहान जी ,श्री पटवाल जी व श्री बुटोला जी राजकीय इंटर कालेज के प्राचार्य जी से अगले दिन होने वाले कैम्प के सिलसिले में मिलने गए प्राचार्य श्री जे। गौतम अवकाश पर थे तो हमने कार्यवाहक प्राचार्य श्री बी। एस. रावत जी से अगले दिन होने वाले कार्यक्रम की चर्चा की व उनको कैम्प में की जाने वाली तैयारियों व गतिविधियों के बारे में जानकारी दी शाम सात बजे हम श्री पटवाल जी के घर पर आ गए और रात्रि का भोजन कर हम सो गए &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#ff0000;"&gt;&lt;strong&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;blockquote&gt;&lt;span style="color:#ff0000;"&gt;&lt;strong&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/blockquote&gt;कैम्प&lt;/span&gt; की कार्यवाही का आरम्भ&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt; &lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;: &lt;span style="color:#cc33cc;"&gt;अगले दिन (12-01-2009) सुबह 9 बजे हम राजकीय इंटर कालेज मानिला पहुच गए ड्राइवर को हमें श्री संग जी व श्री बवाड़ी जी के घर लेने भेज दिया सुबह दस बजे विद्यालय शुरू हुआ कार्यवाहक प्राचार्य श्री बी. एस. रावत जी से मुलाकात कर हमने उन्हें समस्त कार्यक्रम से पुनः अवगत करवाया कैम्प के दिन विद्यालय में फीस जमा करवाने का दिन था इस प्रकार यह ठीक बारह बजे आरम्भ हुआ इस कैम्प में १०२ विद्यार्थियों ने भाग लिया &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;blockquote&gt;&lt;/blockquote&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color:#ff0000;"&gt;टीम के सदस्यों द्वारा विद्यार्थियों को संबोधन&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt; : &lt;span style="color:#009900;"&gt;कैम्प की शुरुआत में श्री ज्योति संग जी ने विद्यार्थियों को संबोधित किया श्री ज्योति संग जी एक विद्वान ,लेखक, चिन्तक ,कवि, पत्रकार व कई भाषाओ के ज्ञाता है श्री संग जी ने विद्यार्थियों को संबोधित करते हुए कहा कि विद्यार्थियों को शिक्षा के क्षेत्र में दक्षता हासिल करनी चाहिए तथा भविष्य के प्रति सचेत रहना चाहिए । उन्होंने प्रतिभागियों को सूचित करते हुए कहा कि शिक्षार्थियों को विविध क्षेत्रों में अपने ज्ञान को व्यावहारिक रूप देने का प्रयास करना चाहिए उन्होंने कहा कि विद्यार्थियों को कंप्यूटर, पत्रकारिता व अपनी रूचि विशेष समर्थित रोजगारों की खोज करनी चाहिए तथा इस दिशा में हर सम्भव प्रयास करना चाहिए । उन्होंने बताया कि वर्तमान समय में फ्रेंच ,जर्मन और अन्य विदेशी भाषाओ को जानने वाले पेशेवरों की काफी कमी है जबकि हमारे देश व अन्य देशों में ऐसे रोजगारों की भरमार है ।&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;blockquote&gt;&lt;/blockquote&gt;&lt;span style="color:#cc33cc;"&gt;इसके बाद श्री नीरज बवाड़ी ने सभी विद्यार्थियों को संबोधित करते हुए कहा कि हमें प्रशासनिक सेवाओ में रोजगार के लिए क्या-क्या तैयारिया और प्रयास करना चाहिए &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;blockquote&gt;&lt;/blockquote&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color:#ff0000;"&gt;विद्यार्थियों के लिए प्रतियोगिता का आयोजन&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt; : &lt;span style="color:#009900;"&gt;श्री ज्योति संग व श्री नीरज बवाड़ी के संबोधन के बाद एक सामान्य ज्ञान व रोजगारोंन्मुख विषयों से सम्बंधित प्रश्नों पर आधारित एक प्रतियोगिता का आयोजन किया गया इस प्रतियोगिता में सभी १०२ छात्र-छात्राओ ने भाग लिया &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;blockquote&gt;&lt;/blockquote&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color:#6600cc;"&gt;प्रतियोगिता में पुरुस्कार पाने वाले विद्यार्थी इस प्रकर से थे: &lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;blockquote&gt;&lt;/blockquote&gt;&lt;span style="color:#ff0000;"&gt;1. दीपक गहतोड़ी (कक्षा XII-B)(प्रतियोगिता में प्रथम स्थान प्राप्त किया) (४००/- रुपये का नकद पुरस्कार दिया गया)&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;blockquote&gt;&lt;/blockquote&gt;&lt;span style="color:#009900;"&gt;2. रजनीकांत नैनवाल (कक्षा XII-B ) (प्रतियोगिता में द्वितीय स्थान प्राप्त किया) (४००/- रुपये का नकद पुरस्कार दिया गया)&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;blockquote&gt;&lt;/blockquote&gt;&lt;span style="color:#3333ff;"&gt;3. रोहित बवाड़ी (कक्षा XII-B ) (प्रतियोगिता में तृतीय स्थान प्राप्त किया) (४००/- रुपये का नकद पुरस्कार दिया गया)&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;blockquote&gt;&lt;/blockquote&gt;&lt;span style="color:#6600cc;"&gt;4. प्रकाश चंद लाखचौरा (कक्षा XII-B ) (प्रतियोगिता में चतुर्थ स्थान प्राप्त किया) (३००/- रुपये का नकद पुरस्कार दिया गया)&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;blockquote&gt;&lt;/blockquote&gt;&lt;span style="color:#ff0000;"&gt;5. कुमारी अंशु सिंह (कक्षा XII-B ) (प्रतियोगिता में पंचम स्थान प्राप्त किया) (३००/- रुपये का नकद पुरस्कार दिया गया)&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;blockquote&gt;&lt;/blockquote&gt;&lt;span style="color:#6633ff;"&gt;6. धर्मेश गहतोड़ी (कक्षा XII-B ) (प्रतियोगिता में षष्टम स्थान प्राप्त किया) (३००/- रुपये का नकद पुरस्कार दिया गया)&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;blockquote&gt;&lt;/blockquote&gt;&lt;span style="color:#006600;"&gt;7. नवीन गहतोड़ी (कक्षा XII-B ) (प्रतियोगिता में सप्तम स्थान प्राप्त किया) (३००/- रुपये का नकद पुरस्कार दिया गया) &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;blockquote&gt;&lt;/blockquote&gt;&lt;span style="color:#ff6600;"&gt;नकद पुरस्कार, प्रमाण-पत्र व स्मृति चिन्ह वितरण समारोह :इस प्रतियोगिता में प्रथम, द्वितया व तृतीय श्रेणी पाने वाले हर छात्र को यंग उत्तराखंड कि ओर से एक स्मृति चिन्ह, एक प्रमाण पत्र और चार सौ रूपये की नकद पुरस्कार दी गई इस प्रतियोगिता में चार अन्य विद्यार्थियों को सान्तवना पुरस्कार स्वरुप एक प्रमाण-पत्र और चारों को तीन सौ रूपये का नकद पुरस्कार दिया गया इस प्रतियोगिता में भाग लेने वाले अन्य सभी विद्यार्थियों को उत्साहवर्धन स्वरुप एक-एक प्रमाण पत्र दिया गया &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;blockquote&gt;&lt;/blockquote&gt;&lt;span style="color:#3333ff;"&gt;इसके बाद श्री पुर्नेंदु सिंह चौहान जी ने विद्यार्थियों को संबोधित किया उन्होंने विद्यार्थियों को बताया की को सरकारी नौकरी कैसे प्राप्त करे व कैसे इसकी तैयारिया करे &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;blockquote&gt;&lt;/blockquote&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color:#ff0000;"&gt;कैम्प का समापन और वापसी&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt; : &lt;span style="color:#006600;"&gt;श्री ज्योति संग द्वारा विद्यार्थियों में लड्डू व बिस्किट वितरित किए गए इस यंग उत्तराखंड द्वारा एक और सफल कैम्प का आयोजन संपन्न हुआ 12-01-2009 शाम को यंग उत्तराखंड की टीम दिल्ली के लिए वापसी का सफर तय करने के लिए मानिला से रवाना हुई रास्ते में रामनगर के समीप माता गिरिजा देवी के शक्तिपीठ के दर्शनों को आतुर टीम के सभी सदस्यों ने इस शक्तिपीठ में जाकर माता का दर्शन किया और आशीर्वाद प्राप्त किया रास्ते में रामनगर बाजार में रात 8 बजे रात्रि भोज करने के उपरांत के सभी सदस्य अपनी शेष यात्रा के लिए चल पड़े &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;blockquote&gt;&lt;/blockquote&gt;&lt;strong&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;span style="color:#ff0000;"&gt;टीम&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="color:#ff0000;"&gt; का दिल्ली आगमन&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt; : &lt;span style="color:#cc33cc;"&gt;गाड़ी ने श्री विवेक जी को उनके इंदिरापुरम स्थित आवास पर रात 2.:30 पर छोड़ा और शेष टीम रात्रि 3 बजे दिल्ली पहुची वंहा से श्री ज्योति संग व श्री नीरज बवाड़ी को फरीदाबाद स्थित आवास पर छोड़ते हुए नेताजीनगर में श्री पुर्नेंदु चौहान को प्रात: 4 बजे उनके आवास पर छोड़ा तथा बाद में श्री विजय बुटोला को नांगलोई स्थित उनके आवास पर प्रात: 4:30 पर छोड़ा श्री विजय बुटोला ने ड्राईवर को गाड़ी के किराये का भुगतान किया और ड्राईवर को विदा किया &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;blockquote&gt;&lt;/blockquote&gt;&lt;span style="color:#ff0000;"&gt;&lt;strong&gt;इस प्रकार यंग उत्तराखंड द्वारा आयोजित यह तीसरा कैरियर गाइडेंस कैम्प का सफल समापन किया यंग उत्तराखंड इस कैम्प में भाग लेने वाले सभी सदस्यों का आभार प्रकट करती है जिन्होंने अपना अमूल्य समय निकल कर इस कैम्प के सफल समापन में अपना उत्कृष्ट योगदान दिया यंग उत्तराखंड उन सभी अन्य साथियो का भी आभार प्रकट करती है जो कि प्रत्यक्ष व परोक्ष रूप से इस जन-कल्याण कार्यक्रम में सहभागी बने &lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;blockquote&gt;&lt;/blockquote&gt;&lt;br /&gt;भवदीय,&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#cc33cc;"&gt;&lt;strong&gt;विजय सिंह बुटोला&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#006600;"&gt;&lt;strong&gt;पब्लिक रिलेशन ऑफिसर&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#3333ff;"&gt;&lt;strong&gt;यंग उत्तराखंड (पंजीकृत) &lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5621615689103488557-2096715803155722364?l=butolavijay.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://butolavijay.blogspot.com/feeds/2096715803155722364/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=5621615689103488557&amp;postID=2096715803155722364' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5621615689103488557/posts/default/2096715803155722364'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5621615689103488557/posts/default/2096715803155722364'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://butolavijay.blogspot.com/2009/01/12-2009-10-2009-1-2-3-4-5-845-5-11-01.html' title='तीसरा कैरियर गाइडेंस कैम्प मानिला, अल्मोडा (उत्तराखंड)'/><author><name>Vijay Singh Butola</name><uri>http://www.blogger.com/profile/10701971246743120104</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='31' height='32' src='http://3.bp.blogspot.com/_HvC2cLQkeYw/SXla3t65CLI/AAAAAAAAAEw/luftISiSRhs/S220/Copy+of+000_0903.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/_HvC2cLQkeYw/SXAndWd9zmI/AAAAAAAAAEc/EMwIrRfzfXQ/s72-c/5.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5621615689103488557.post-8316284832583315845</id><published>2009-01-05T11:37:00.003+05:30</published><updated>2009-01-05T12:40:00.443+05:30</updated><title type='text'>ऐ इंसान जरा तू ठहर</title><content type='html'>&lt;div align="left"&gt;&lt;span style="color:#ff0000;"&gt;ऐ इंसान जरा तू ठहर&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#009900;"&gt;जीवन कि इस दैनिक भागदौड़ में&lt;br /&gt;इंसान का अपना वजूद खो गया है आशाओ के भंवर में&lt;br /&gt;सब कुछ पा लेने कि चाहत में मशगुल है इस तरह&lt;br /&gt;न चाहते हुए भी भूल गया है ख़ुद को खोजता है दुसरो के अक्स में&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#3333ff;"&gt;दिन भर व्यस्त रहकर मग्न है अपने काम में&lt;br /&gt;फुरसत नही है दो जून लेने कि सुबह हो या शाम में&lt;br /&gt;सपनों का संसार बुना है उसने अपने मन के ताने-बने में&lt;br /&gt;जाने कब होंगे पूरे सपने उसके बात होती है हर अफसाने में&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#ff0000;"&gt;बेसुध इंसान पा लेना चाहता है हर उस मुकाम को&lt;br /&gt;बाकि सब कुछ याद है भूल गया है बस आराम को&lt;br /&gt;इस भागदौड़ में हर कोई इस कदर आगे पहुचना चाहता है&lt;br /&gt;पाने को अपनी मंजिल कोई खून तो कोई पसीना बहाता है&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#cc33cc;"&gt;न जाने कब मिटेगी इंसान कि ये तृष्णा और पिपासा&lt;br /&gt;सच आता है जब सम्मुख रह जाता है फिर भी प्यासा&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#006600;"&gt;क्या लाया था इस जग में न दौड़ इस कदर&lt;br /&gt;कर कर्म होगा सब मनचाहा ऐ इंसान जरा तू ठहर ....जरा तू ठहर&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5621615689103488557-8316284832583315845?l=butolavijay.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://butolavijay.blogspot.com/feeds/8316284832583315845/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=5621615689103488557&amp;postID=8316284832583315845' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5621615689103488557/posts/default/8316284832583315845'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5621615689103488557/posts/default/8316284832583315845'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://butolavijay.blogspot.com/2009/01/blog-post.html' title='ऐ इंसान जरा तू ठहर'/><author><name>Vijay Singh Butola</name><uri>http://www.blogger.com/profile/10701971246743120104</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='31' height='32' src='http://3.bp.blogspot.com/_HvC2cLQkeYw/SXla3t65CLI/AAAAAAAAAEw/luftISiSRhs/S220/Copy+of+000_0903.jpg'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5621615689103488557.post-5840983546536145314</id><published>2008-12-15T18:27:00.007+05:30</published><updated>2009-01-05T12:41:29.542+05:30</updated><title type='text'>दूसरा ब्यो कु विचार (गढ़वाली हास्य कविता )</title><content type='html'>&lt;div align="left"&gt;&lt;span style="color:#6633ff;"&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="left"&gt;&lt;span style="color:#6633ff;"&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt; &lt;/div&gt;&lt;div align="left"&gt;&lt;span style="color:#6633ff;"&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="left"&gt;&lt;span style="color:#6633ff;"&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="left"&gt;&lt;span style="color:#6633ff;"&gt;एक दिन दगडियो आई मेरा मन माँ एक भयंकर विचार&lt;br /&gt;की बणी जौँ मैं फिर सी ब्योला अर फिर सी साजो मेरी तिबार&lt;br /&gt;ब्योली हो मेरी छड़छड़ी बान्द जून सी मुखडी माँ साज सिंगार&lt;br /&gt;बीती ग्येन ब्यो का आठ बरस जगणा छ फिर उमंग और उलार&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#009900;"&gt;पैली बैठी थोऊ मैं पालंकी पर अब बैठण घोड़ी पकड़ी मूठ&lt;br /&gt;तब पैरी थोऊ मैन पिंग्लू धोती कुरता अब की बार सूट बूट&lt;br /&gt;बामण रखण जवान दगडा ,बूढया रखण घर माँ&lt;br /&gt;दरोलिया रखण काबू माँ न करू जू दारू की हथ्या-लूट&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#3333ff;"&gt;मैन यु सोच्यु च पैली धरी च बंधी कै गिडाक&lt;br /&gt;खोळी माँ रुपया दयाणा हजार नि खापौंण दिमाक&lt;br /&gt;फेरो का बगत अडूनु मैन मांगण गुन्ठी तोलै ढाई&lt;br /&gt;पर डरणु छौं जमाना का हाल देखि नहो कखी हो पिटाई&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#ff6600;"&gt;पैली होई द्वार बाटू ,बहुत ह्वै थोऊ टैम कु घाटू&lt;br /&gt;गौं भरी माँ घूमी कें औंण, पुरु कन द्वार बाटू&lt;br /&gt;रात भर लगलू मंड़ाण तब खूब झका-झोर कु&lt;br /&gt;चतरू दीदा फिर होलू रंगमत घोड़ा रम पीलू जू&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;तब जौला दुइया जणा घूमणा कें मंसूरी का पहाडू माँ&lt;br /&gt;दुइया घुमला खूब बर्फ माँ ठण्ड लागु चाई जिबाडू माँ&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#cc33cc;"&gt;ब्यो कु यन बिचार जब मैन अपनी जनानी थैं सुणाई&lt;br /&gt;टीपी वीँन झाडू -मुंगरा दौड़ी पिछने-२ जख मैं जाई&lt;br /&gt;कन शौक चढी त्वै बुढया पर जरा शर्म नि आई&lt;br /&gt;अजौं भी त्वैन जुकुडी माँ ब्यो की आग च &lt;/span&gt;&lt;span style="color:#cc33cc;"&gt;लगांई&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#3333ff;"&gt;नि देख दिन माँ सुप्नाया, बोलाणी च जनानी&lt;br /&gt;दस बच्चो कु बुबा ह्वै गे कन ह्वै तेरी निखाणी&lt;br /&gt;मैं ही छौं तेरी छड़छड़ी बान्द देख मैं पर तांणी&lt;br /&gt;अपनी जनानी दगडा माँ किले छ नजर घुमाणी&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#ff0000;"&gt;तब खुल्या मेरा आँखा-कंदुड़ खाई मैन कसम&lt;br /&gt;तेरा दगडी रौलू सदानी बार बार जनम जनम&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color:#cc33cc;"&gt;रचनाकर :- विजय सिंह बुटोला&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#33cc00;"&gt;दिनांक :- 15-12-2008&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5621615689103488557-5840983546536145314?l=butolavijay.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://butolavijay.blogspot.com/feeds/5840983546536145314/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=5621615689103488557&amp;postID=5840983546536145314' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5621615689103488557/posts/default/5840983546536145314'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5621615689103488557/posts/default/5840983546536145314'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://butolavijay.blogspot.com/2008/12/blog-post_9378.html' title='दूसरा ब्यो कु विचार (गढ़वाली हास्य कविता )'/><author><name>Vijay Singh Butola</name><uri>http://www.blogger.com/profile/10701971246743120104</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='31' height='32' src='http://3.bp.blogspot.com/_HvC2cLQkeYw/SXla3t65CLI/AAAAAAAAAEw/luftISiSRhs/S220/Copy+of+000_0903.jpg'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5621615689103488557.post-3799467046287878747</id><published>2008-12-12T11:35:00.004+05:30</published><updated>2008-12-29T11:57:02.869+05:30</updated><title type='text'>क्या मिली ग्ये हम्थैं हमारू सुपिन्यो कु उत्तराखंड ?</title><content type='html'>बरसू का त्याग, प्रयास व् बलिदान का बाद हमुन 9 नवम्बर 2000 मा अपणु पृथक उत्तरांचल राज्य पाई | 1 जनवरी 2007 माँ स्थानीय लोगों की भावनाओं थैं ध्यान मे राखी थै उत्तराखंड कु नाम आधिकारिक तौर पर उत्तरांचल सी बदली कीं उत्तराखंड करी छोऊ |&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आज जबकि उत्तराखंड एक अलग राज्य बणी ग्ये तब भी हम्थैं आज वू राज्य नि मिली जैकू सुपना हम सब्बी न मिल कर देखि थोऊ | आज उत्तराखंड आठ साल कु ह्वै गे पर विकास का नाम पर उत्तराखंड मा कुई भी खास प्रगति नि होई | पृथक राज्य की मांग हमुन अपना पहाड़ व् पहाड़ का लोगो का विकास खातिर करी थोऊ परन्तु आठ साल ह्वै गैन पहाड़ अभी भी विकास का खातिर तरसाणु च | &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उत्तरांचल राज्य गठन सि पैली प्रस्तावित उत्तरांचल राज्य म 17 विधायक था जू अब बढ़ी कें 70 ह्वै गैन तथा 1 विकास मंत्री होन्दु थोऊ जू अब बढ़ी कें 12 ह्वै गैन परन्तु विकास का नाम पर कुछ खास काम नि च होण लग्युं | स्थानीय जनता का अनुसार उत्तरांचल राज्य का गठन का बाद असली विकास त केवल नेताओ और धनवान लोगो कु ह्वै गरीब त वखि का वखि रै गैन |उत्तराखंड कु विकास व राज्य की वर्तमान स्तिथि मूल्यांकन हेतु आज भी हमारी टक्क कई मुद्दों व विषयो पर लगी च जू की अभी भी जनता की नजरू म अधूरी छन | &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आठ साल म तीन बार सरकार बणी आर बदली  चार मुख्यमंत्री  ह्वेन पर विकास कु मुद्दा केवल घोषणा पत्र का काला आखारो म हर्ची ग्ये  | आज हमारा समणी उत्तराखंड का विकास सी सम्बंधित कई यक्ष प्रशन खड़ा छन होया जौंकू उत्तर का प्रति उत्तराखंड की जनता आज भी प्रतीक्षा म खड़ी च | कुछ जरुरी प्रश्न ये प्रकार सी छन |&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;पहाड़ म रोजगार का खातिर युवाओ कु पलायन कब रुकलु &lt;br /&gt;पहाड़ म बेहतर शिक्षा प्रणाली कब लागु होली &lt;br /&gt;पहाड़ म हर गौं तक सड़क कब जाली&lt;br /&gt;पहाड़ म पर्यटन कु वास्तविक विकास कब होलू &lt;br /&gt;पहाड़ म स्वास्थ्य सुविधा कब आली &lt;br /&gt;गैरसैण राजधानी अस्तित्व म कब आली &lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;सबसी पैली मैं यख बात पलायन कि करदू &lt;/strong&gt;, आज उत्तराखंड का शिक्षित युवा वर्ग रोजगार का आभाव म अपनी जन्मभूमि सी पलायन करणा कें मजबूर छ ,करण केवल एक रोजगार का साधनों की कमी | मैं कखी पढ़ी थोऊ की पिछला 10 वर्षु मा पहाड़ सी 12 लाख सी भी ज्यादा  लोग पलायन करी ग्येन | निरंतर पलायन सी विकास पर असर पड़ण लग्य्नु छ अगर हम केवल सांसद तथा विधायक निधि पर विशेषण करू त  ये वजह सी  पर्वतीय क्षेत्र थैं  लगभग १६  करोड़ रूपए सालाना  नुकसान होनु चा । ई  औसत सी  प्रदेश की 4 हजार करोड़ की मानक विकास योजना कि बात करी जाए त पर्वतीय क्षेत्र थैं  साल भर माँ  30 करोड़ रूपयों की हानि होणि चा । निरंतर पलायन सी असर जनसँख्या पर भी पड़ी और हमारा राज्य मा जह्संख्या का हिसाब सी आठ विधान सभा की सीट कम ह्वै ग्येन | लगभग 40 करोड़ रूपये की वार्षिक विधायक निधि जू की यौं आठ विधानसभा सीटो थीं मिलदी वै सी हम सबी वंचित ह्वै गयौं |   पहाड़ सी पलायन कु असर पर्वतीय क्षेत्रो थैं मिलण वाळी योजनाओ पर भी पड़लू | हालाकि मैदानी क्षेत्रो मा कुछ बड़ा उधमियो न अपना प्लांट स्थापित जरुर करी छन परन्तु तब भी पहाड़ का युवाओ थैं रोजगार का अवसर अभी भी गिन्या -चुन्या छन | जरुरत च एक मजबूत निति बनौन की जैसी उत्तराखंड का मूल निवासियों कें वखि रोजगार मिलो और पहाड़ का लोग पलायन का वास्ता मजबूर न हो सक्या | &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उत्तरांचल राज्य गठन का बाद मैदानी भाग व पहाड़ी कस्बो मा &lt;strong&gt;शिक्षा का स्तर म सुधार &lt;/strong&gt;अवश्य आई ,आज पर्वतीय शहरी क्षेत्रो मा कै जगह पब्लिक स्कुल भी खुलीं ग्ये लेकिन गरीब आदमी आज भी अपणा बच्चो कें वख नि पढै सकदु परन्तु राज्य का दूर दराज का पहाड़ी क्षेत्रो व गावो मा अभी भी शिक्षा कु स्तर नुय्नतम छ |  राज्य का ग्रामीण पहाड़ी क्षेत्रो मा अभी भी कई विद्यार्थी अपना घर सी 5-6 किलोमीटर दूर स्कुल जांदा छन | स्कुलो मा शिक्षो व जरुरी संसाधनों की कमी छ | मैन कई बार यां भी देखि की स्कुल मा अध्यापक अपना कर्तव्य सी ज्यादा अपना होळ-तंगलू व घर का काम काज मा ज्यादा व्यस्त रंदा छन |शिक्षा की ही बात ली लयवा 250 सी भी ज्यादा  गांवों का बच्चों थैं जूनियर हाई स्कूल माँ पढ़ना का वास्ता चार-पॉँच कि.मी. सी  भी दूर जणू पड़दू | सरकारी आंकडो अनुसार 2500 का लगभग गांवों माँ सीनियर बेसिक स्कूल , 7500 का लगभग  गांवों माँ  सीनियर स्कूल व  3600 गावों का बच्चो थैं  हायर सेकेण्डरी स्कूल चार-पॉँच कि.मी. सी भी दूर छ | अब हम सभी सिच सकदा छन की राज्य म बच्चो की शिक्षा कु विकास कन कै हो सकदु |सरकारी आंकडो का अनुसार राज्य गठन का  आठ साल बाद भी उत्तराखंड राज्य माँ  निरक्षरों की संख्या कुल 84 लाख की आबादी माँ सी  33 लाख 83 हजार 567 छ | यनी बेरोजगारों जनता की संख्या सात लाख तक ह्वै ग्ये |&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अब मी बात प्रस्तावित &lt;strong&gt;राजधानी गैरसैण का मुद्दा &lt;/strong&gt;पर करण चांदो जू की आज भी अधर म लटकी छ | परन्तु एक लंबा संघर्ष का बाद जब हमारी आँखी खुली त हमुन अपना सपुना बिखरदा देखि , राजधानी का नाम पर हम्थैं गैरसैण का बदला देहरादून देखणा कु मिली | यदि हम पहाड़ कु विकास चांदो त राजधानी भी पहाड़ म होई चैन्दि न की मैदानी भाग म |  वन त राजधानी की घोषणा सन 1992 म उक्रांद नेता श्री कशी सिंह ऐरी जी ने करी थाई पर आज वर्तमान सरकार म सहभागी होणा का बाद भी उक्रांद आज अपणु वादू भूली ग्ये | सभी सरकारू का घोषणा पत्र म राजधानी कु मुद्दा विशेष मुद्दा थोऊ पर आज कुई भी पार्टी गैरसैण कें राजधानी नि बन्ये सकी |कैन या बात सच बोली च की राजधानी कु मुद्दा अब अंगद कु पाँव ह्वै गी जैके देहरादून सी हिलौंण असंभव छ |मैन एक लेख कखी पढ़ी थोऊ जैक अनुसार कि पर्वतीय राज्य की राजधानी पर्वतीय क्षेत्र माँ ही होणी चैन्दि ताकि वाख का लोगु का उत्थान का वास्ता कार्य किए जा सकू | अगर जू  पर्वतीय राज्य की राजधानी पर्वतीय क्षेत्र माँ होली त येन सारा  क्षेत्र कु विकास अफी ह्ववे होण लगलू । आज जू  इस पहाड़ी क्षेत्र सी रोजगार की तलाश माँ पहाड़ सी पलायन च होण लग्य्नु वू ऐके रोकना माँ काफी कारगर सिद्ध होलू तबई लोग वाख रुकी सकदा | ऐकू समाधान कु एक तरीका और भि ह्वै सकदु जन कि हिमाचल तथा जम्मू कश्मीर का जन  भी व्यवस्था ह्वै सकदी  कि राजधानी छह माह गैरसैंण में राली  और छह माह देहरादून माँ । ई युक्ति सी पहाड़ी क्षेत्र की उपेक्षा भि नि होली अर पहाड़ी राज्य की सार्थकता भी साकार सकदी | समय समय पर कै संगठन गैरसैण राजधानी का मुद्दा पर आन्दोलन व रैली करदा रंदा , सम्पूर्ण हिमालयी क्षेत्र पूर्व से पश्चिम तक वर्तमान समय माँ अशांत होणु चा | भगवन जाणु कखी यु भि एक बदु जन आन्दोलन कु रूप न लिले और हुम्थें एकी भरी कीमत चुकाण पड़े ।  जैमा मात्र उत्तराखण्ड और हिमाचल द्वी राज्य छन जख अभी तक यन काली छाया नि पड़ी । जन मानस का मनु थैं शांत रखणा का नजरिया सी  भी पर्वतीय क्षेत्र की राजधानी स्थायी रूप से आन्दोलन का  प्रतीक मन्यि  तथा प्रदेश की जनता माँ  सर्वमान्य भाव सी  स्वीकृत गैरसैंण थैं ही राजधानी बणोंण ठीक हुलु | &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;राज्य सरकार का आंकडा &lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;उत्तराखण्ड राज्य स्थापना थैं आठ साल पुरा ह्वै गयेन  | प्रदेश कि राज्य सरकार का अर्थ एवं संख्या विभाग का  आंकड़ों का अनुसार प्रदेश माँ आज भि गरीबी की सीमा रेखा सी निस जीवन यापन करण  वाल परिवारू की संख्या छ: लाख तेईस हजार 90 तक पहुंच ग्ये |  राज्य गठन का समय ई संख्या तीन लाख 75 हजार का  करीब थै । मतलब आज गरीबी दुगनी ह्वै ग्ये | उत्तराखण्ड की 3800 सि भी ज्यादा गाव घोर पेयजल संकट सी तथा १२ हजार सी भी ज्यादा गाव आंशिक पेयजल संकट सी जूझाणा छन | राज्य सरकार का आंकडा बातौंद छन कि उत्तराखंड राज्य का अस्तित्व माँ औण का  बाद भी उत्तराखण्ड का कई गांवों माँ लोगों थैं एक भांडू पानी का खातिर कैए कोस दूर जणू पड़दू |  यनी लगभग 8700  गांवों माँ ऐलोपैथिक अस्पताल भी पांच कि.मी. सी भी ज्यादा दूर छा |  उत्तराखंड में सड़क मार्गो आज भी विकास कु बाटू देखणा छन | राज्य की कुछ सड़क बहुत अच्छी स्तिथि मा छन परन्तु ग्रामीण व दूर दराज का क्षेत्रो मा आज भी सडको की हालत बहुत ख़राब छ | हलाकि पिछला आठ वर्षु मा विभ्भिन सड़क योजनाओ का मध्यम सी बहुत गावो मा सड़क पौंची छ लेकिन डामरीकरण आज भी नि ह्वै | हम रोज सुणदा रंदा की आज फलाणी-फलाणी जगा दुर्घटना ह्वै ,कारण एक छ सड़क्यो की ख़राब हालत | आज भले ही उत्तराखंड मा गाव-गाव मा सड़क आगे होली परन्तु उनकू ढंग सी रखरखाव का आभाव मा हालत और भी ख़राब ह्वै ग्येन |2200  गांव यां छान जू कि आज भी  पक्की सडक़ों सी दूर छान  और उनमें लगभग 900 गांव यं छान जू कि  सडक़ से 30 कि.मी. से अधिक दूर छन । 3000   गांवों माँ  बस स्टाप आज भी  पांच कि.मी भी ज्यादा दूर छा | रेलवे स्टेशन तो 15000 का लगभग  गांवों की पहुंच सी दूर छा |&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;em&gt;" उत्तराखंड में पर्यटन कु  विकास आज भी लगी छ आस " &lt;/em&gt;आठ बर्शु बाद भी उत्तराखंड मा प्रस्तावित वीर चन्दरसिंह गढ़वाली पर्यटन विकास योजना ठीक ढंग सी कार्यान्वित नि ह्वै सकी | आज भी पर्यटन का विकास सी सम्बंधित कै व्यावहारिक दिक़्कतें समणी छन | विभ्भिन योजनाओ का अनुसार आज मात्र 10% ही काम पर्यटन का विकास का क्षेत्र मा होई 90% काम अभी भी बाकी चा | ई बात जग जाहिर छ की उत्तराखंड मा पर्यटन की सम्भावनाये आपर छन परन्तु सरकार ये मामला मा अभी जागरूक नि चा | यदि पर्यटन स्थलों कु विकास होलू और नई नई जगहों की खोज होली तभी उत्तराखंड मा पर्यटन कु विकास सम्भव छ | जब राज्य मा नए होटलों, झीलों, हवाई पट्टियों ,क्रीडा-स्थलों कु निर्माण सडको, मंदिरों व संस्कृतिक धरोहरों कु रख रखाव हुलु तभी सही अर्थो मा विकास सम्भव छ | &lt;em&gt;पर्यटन का विकास होलू त रोजगार भी घररय्या बिरालु सी पिछने पिछने आलू |&lt;/em&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उत्तरांचल मा आठ वर्षु बाद भी &lt;strong&gt;स्वास्थ्य सुविधाए &lt;/strong&gt;न का बराबर छन  हलाकि सरकार का प्रयास सी राज्य मा 108 एम्बुलेंस सेवा की शुरआत ब्लाक स्तर पर  ह्वै छ  परन्तु दूर दराज का पहाड़ी गाव आज भी यां सुविधाओ का आभाव मा मरणा छन | सरकार बेशक स्वास्थ्य सुविधाओ कु विस्तार की बात करू पर सच्ची बात सब जाँणदा की असल मा जरुरतमंद लोग अभी भी ये सुविधा का लाभ  सी दूर छन | पहाड़ी क्षेत्रो मा भौत सी महिलाये प्रसव पूर्व उपचार का आभाव मा काल कु ग्रास बन जांदी | राजकीय चिकित्सालयों मा दवाइयों व डाक्टरों कु आभाव छ |   स्वास्थ्य सुविधाओ कु विस्तार केवल शहर व कस्बो तक ही सीमित छ | उत्तराखंड की तक़रीबन समस्त अर खास कर ग्रामीण, गरीब और पहाड़ी जन समुदाय पूरी तरह सी सरकारी चिकित्सा व्यवस्था पर निर्भर छ और सरकार 50% अस्पतालों माँ डाक्टर उपलब्ध नि छ करै सक्नी । उतरांचल बणन सी पैली भी पहाड़ माँ सबसे बड़ी समस्या स्कूलों म शिक्षकों और अस्पतालों माँ डाक्टरों अर दवाई कि कमी कि वजह सी थै | &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;em&gt;अगर हम सब अपना उत्तराखंड थैं वास्तव माँ विकसित, खुशहाल व प्रगतिशील बनौण चांदा त हम सभी थैं एकजुट ह्वै कें प्रयास करणु पड़ोलो | आज बड़ी खुशी की बात ई च की उत्तराखंड का लोग विभ्भिन क्षेत्रो मा तथा विभ्भिन गैर सरकारी संगठनो का माध्यम सी वखा का जन समुदाय का खातिर प्रयासरत्त छन व समाज सेवा मा अपनी भागीदारी निभौना छन | निष्कर्ष का तौर पर आज उत्तराखंड मा विकास कार्य होणु त छ पर मंद गति सी | विकास कार्य तभी तीव्र गति सी ह्वै सकदु जब हम सब जागरूक बणु तथा नियोजित योजनाओ पर नजर रख सक्या |&lt;/em&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;em&gt;कुछ जरुरी कदम उठौन पडला तब जै कें कुछ प्रगति व विकास ह्वै सकदु |&lt;/em&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;रोजगार का क्षेत्र मा&lt;/strong&gt; :- जन की पीली भी मैं लिखी की रोजगार का आभाव मा आज शिक्षित युवा वर्ग अपणी मिटटी छोड़ी कें शहर मा पलायन करना का वास्ता मजबूर छन | सरकार कें ये विषय पर रोजगार निति बनोंण पडली ताकि योग्यता का हिसाब सी सबु कें रोजगार उपलब्द ह्वै सकू |  &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;कृषि का क्षेत्र मा&lt;/strong&gt; :- हमारा पहाडो मा जमीन आज भी हम पारंपरिक खेती करदा छन | उत्तराखंड मा जलवायु और मिटटी जैविक व आधुनिक खेती का वास्ता अति उत्तम चा |आज भी 90% लोग रासायनिक खाद कु उपयोग करणा का बजाय गोबर की खाद कु प्रयोग करदा छन | आज हम अगर फल, सब्जी, दाले, तिलहन, सोयाबीन, कपास, अदरक, हल्दी ,लहसुन, मशरूम, व जडी-बूटी की खेती करा त हम आत्म-निर्भर बणी सकदा | उत्तरांचल राज्य की विविध जलवायु तथा विभिन्न ऊंचाई वाला क्षेत्रों थैं  ध्यान माँ राखि थैं सरकार न प्रदेश  स्तर पर कृषिकरण का वास्ता करीब 26 महत्वपूर्ण प्रजातियों क्रमशः अतीस, कुटकी, कूठ, जटामांसी, चिरायता, वनककड़ी, फरण, कालाजीरा, पाईरेथ्रम, तगर, मंजीष्ठ, लेमनग्रास, बड़ी ईलायची, पत्थरचूर, रोजमेरी, जिरेनियम, सर्पगंधा, कलिहारी, सतावर, स्टीविंया, सीलिबम, पीपली, अमीमेजस, तिलपुष्पी, कैमोमाईल व ब्राम्ही चयनित की है | ई योजना का अंतर्गत कश्ताकारू थैं अनुदान भि दिए जालू |उंका उत्पाद की निकासी एवं विपणन थैं सुगम बनौन तथा प्रदेश स्तर पर डाटाबेस तैयार कारन का वास्ता काश्तकारों कु पंजीकरण की व्यवस्था भी करी च । ताकि आम जनमानस का  साथ-साथ काश्तकारों कें भी वैकु समुचित लाभ मिली सकू | &lt;br /&gt;अब देखा सरकार न त व्यवसायिक कृषिकरण द्वारा जड़ी-बूटियों का उत्पादन थैं बढ़ावा देण की दिशा माँ प्रयास शुरू करी छन , अब इ प्रयास कख लिजंदा आप भि देखिं |&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पहाड़ मा पशुपालन, मतस्य पालन, मुर्गी पालन, मधुमख्खी पालन, जडी-बूटी व ओषिधि कृषि कु कार्य न का बराबर होन्दु |यदि ये क्षेत्र मा उचित मार्गदर्शन व सरकार द्वारा अनुदान देणा की योजनाओ कें सुलभ बनये जाऊ त यौन क्षेत्रो मा भी प्रगति ह्वै सकदी और स्व- रोजगार की सम्भावनाये भी उपलब्ध ह्वै सकदी | मैं कई जगा देखि की नेपाली लोग पहाड़ मा लुकारा पुन्गाडा मा व फल, सब्जी, दाले, तिलहन, सोयाबीन, कपास, मशरूम, व जडी-बूटी की खेती करी कें बहुत पैसा छन कमौना | यदि लोग भैर बीती अई कें हमारी जमीन पर आधुनिक खेती कर सकदा त हम किले नि कर सकदा ?   &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आज पहाड़ की हालत यां ह्वै गी की लोग देखण कु भी नि मिलदा | जू लोग वख छन (सरकारी कर्मचारियों छोड़ी कें ) वू भी कुछ कुछ खास काम नि करदा बस दिन भर ताश खेली रुमुकी दारू पीणा छा | वन त प्रधानमंत्री रोजगार योजना मा कध्यम सी आज लगभग सभी लोग विभ्भिन योजनाओ मा काम छन करणा परन्तु पहाड़ मा दारू कु दानव आज बहुत लोगु पर हावी च | अपनी सब करी -कमाई दारू मा छन उडौना | पहाड़ की महिला कु जीवन आज भी वखि छ जख पीली छा | आज पंचायती राज मा महिलाओ थैं हलाकि 50% की हिस्सेदारी छा परन्तु ऊन भी क्या कन्न अपणु घर कु काम कन्न या राजनीती मा योगदान देण | आज भले ही वर्तमान पंचायात चुनावु मा महिलाये 55% विजयी ह्वैन परन्तु पुरूष प्रधान समाज मा आज भी वो अपनी शशक्त आवाज नि उठाई सकदी | जरुरत च जागरूकता की ,महिलाओ थैं पुरु सम्मान व अधिकार देणा की | &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पहाड़ का वास्तविक विकास तभी ह्वै सकदु जब पहाड़ की जनता जागरूक हो | सुचना कु अधिकार कु प्रयोग करी वो थैं अपनी ग्राम-पंचायत व सभी सरकारी योजनाओ का बारा मा पूछ सकदी ,जैकी की पहाड़ मा भरी कमी छा |&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;आज जरुरत छ निस्वार्थ भावः: व समर्पित भावः सी एकजुट ह्वै काम करणा कि तभी हम्थैं हमारू सुप्नियो कु विकसित व खुशहाल उत्तराखण्ड मिल सकदु जैकू सुपना हमुन व हमारा अमर शहीद भाई बैणी न देखि थूऊ |त आवा अपना समर्थ का अनुसार प्रयास करा अर अपना सुप्निया सच होंदा देखा |&lt;/strong&gt; &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;जय बद्री बिशाल : जय उत्तराखण्ड&lt;br /&gt;विजय सिंह बुटोला&lt;br /&gt;दिनांक : 11-12-2008&lt;/strong&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5621615689103488557-3799467046287878747?l=butolavijay.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://butolavijay.blogspot.com/feeds/3799467046287878747/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=5621615689103488557&amp;postID=3799467046287878747' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5621615689103488557/posts/default/3799467046287878747'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5621615689103488557/posts/default/3799467046287878747'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://butolavijay.blogspot.com/2008/12/blog-post_12.html' title='क्या मिली ग्ये हम्थैं हमारू सुपिन्यो कु उत्तराखंड ?'/><author><name>Vijay Singh Butola</name><uri>http://www.blogger.com/profile/10701971246743120104</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='31' height='32' 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href="http://2.bp.blogspot.com/_HvC2cLQkeYw/SVhpFWeKpVI/AAAAAAAAAEQ/r7hyZOt3HGY/s1600-h/71.jpg"&gt;&lt;img style="cursor:pointer; cursor:hand;width: 400px; height: 300px;" src="http://2.bp.blogspot.com/_HvC2cLQkeYw/SVhpFWeKpVI/AAAAAAAAAEQ/r7hyZOt3HGY/s400/71.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5285089703371646290" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;श्री पुर्नेंदु सिंह चौहान, श्रीमती पूनम चौहान, श्री विपिन पंवार, श्री विजय कुकरेती, श्री विजय सिंह बुटोला, श्री सुशील सेंदवाल , श्री मनीष कुमार, श्री आशीष पंथारी, श्री बलबीर राणा &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;कैम्प की तैयारी &lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैंने 28-11-2008 को आफिस से छुट्टी ले ली थी | सारा दिन अपनी श्रीमती जी के साथ घर के काम-काज निपटाने के बाद मैंने रास्ते के लिए थोड़ा भोजन बनाने की तैयारी की | आलू उबाल के जख्या में छौंक लगा कर मैंने आलू के गुटके बनाये | आलू के गुटको को छौंकने के साथ साथ मैंने गौं की लाल मिर्च भी तली (भुन्टी मर्च)| मैंने भी अपनी श्रीमती जी के साथ पूरिया बनाई व् सलाद भी बनाया | &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;यात्रा का शुभारम्भ &lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जैसा की पूर्वनिर्धारित था की सब शाम 7:30 पर कश्मीरी गेट बस अड्डे पर एकत्रित होंगे | गाड़ी सभी को लेकर वही से जायेगी | सबसे पहले हमारे बीनू भाई जी शाम 7:00 बजे  कश्मीरी गेट बस अड्डे पर पहुचे ,फिर विपिन भाई जी व् सुशील सेंद्वाल फिर मैं भी 7:15 पर पहुच गया |  अब इंतजार था हमारे यंग उत्तराखंड की महान हस्ती महान लेट-लतीफ श्री श्री 108 पुर्नेंदु चौहान जी का , तो वो भी अपनी श्रीमती जी (श्रीमती पूनम चौहान जी ) व साथ में हमारे होने वाले भावी C.A  साहब श्री मनीष कुमार जी के साथ ठीक 8:00 बजे पहुचे | वैसे तो ड्राइवर भी गाड़ी लेकर 8:10 पर आया था इसलिए साहब जी को बचने और बोलने का अच्छा मौका मिल गया था | इनकी प्रतीक्षा करते करते हम सभी के गले सूख गए थे सो हमने एक दो लीटर की कोक की बोतल ली और अपनी प्यास बुझाई | आप सब जानते हो दोस्तों , क्योंकि ये दिल मांगे मोर |&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अब चली गाड़ी जिसमे सवार थे बीनू भाई जी और सुशील सेंद्वाल जी सबसे आगे ड्राइवर के साथ | बीच में हमारे साहब जी और मेमसाहब जी | पीछे की सीट पर हम बेचारे -हालात के मारे विपिन भाई और मैं |दिल्ली से चलने से पहले हमें गाड़ी में डीजल भरवाया फिर  आशीष पंथारी जी ने हमें मोहननगर के गाजियाबाद -मेरठ रोड के मोड़ पर मिलना था सो हमने उनको वहा से 9:30 पर पिकप कर लिया | बेचारे पंथारी जी हमारा इंतजार वहा पर पिछले दो घंटे से कर रहे थे |&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;रास्ते में पहाड़ी गानों का आनंद लेते हुए हमने मुजफ्फर नगर तक का सफर काटा | मुजफ्फर नगर में हमने खाना खाया | जैसा की मैंने पहले बता की मैं भी घर से थोड़ा खाना लाया था और पुर्नेंदु भाई जी भी घर से मेथी  के मजेदार परोंठे और नमकीन लाये थे सो हम सभी ने कुछ और खाने का आर्डर दे कर वह सब खाना मिल कर खाया |खाना खाकर हम गाड़ी में बैठे और अपने गंतव्य की ओर चल पड़े | &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;रास्ते की कठिनाइया&lt;/strong&gt;   &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अभी थोडी दूर ही सफर तय किया था की मंगलौर के पास उत्तरांचल-उत्तरप्रदेश के बॉर्डर पर हम जाम में फँस गए | हमारे साथ कुछ इसे महानुभाव भी थे जिनको यह पता ही नही चला की हम दो घंटे से जाम में फंसे पड़े हैं .............क्योंकि वो तो सोने में मस्त थे |  करीब दो घंटे के इंतजार के बाद जैसे -तैसे जाम खुला तो हम फिर अपनी आगे की शेष यात्रा को पुरा करने हेतु निकल पड़े | मेरी धर्मपत्नी जी ने जो कम्बल मुझे सर्दी से बचने के लिए दिया था वो भी मौकापरस्त लोगे ने मुझसे हथिया लिया और मैं पूरे रास्ते सर्दी से कांपता रहा जैसे कोई भीगी बिल्ली हो | &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;देवभूमि उत्तराखंड में हमारा प्रवेश&lt;/strong&gt; &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;खैर , हम सभी 3:15 सुबह दिनांक 29-11-2008  को ऋषिकेश पहुच गए | यहाँ पर ठण्ड वास्तव में अनुमान के मुताबिक कही ज्यादा थी | कुछ सोने वाले सह-यात्रियों  को अभी भी यह मालूम नही था कि देवभूमि उत्तरांचल, ऋषिकेश में पदार्पण कर चुके हैं | जैसे -तैसे उनको चाय पीने के लिए जगाया गया पर नीद तो जैसे उन पर हावी हो रखी हो..भगवान जाने कितना सोते है ये लोग ?  सुबह की चाय की चुस्कियों का आनंद लिया थोड़ा फ्रेश हुए तब फिर हम चल पड़े अपने कर्मपथ पर | &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ऋषिकेश से ३:३० पर चलने के बाद चंद्रभागा नदी पर बने पुल को पार करके हम प्रकृति के असीम सौन्दर्य पहाडो पर यात्रा का आनंद लेने लगे | कुछ दुरी तय करने के बाद हम श्री भद्रकाली मन्दिर के पास  उत्तरांचल पुलिस के बने जाँच चौकी पर पहुचे वहा सभी वाहन रुके हुए थे क्यूंकि सुबह पॉँच बजे से पहले कोई भी वाहन सुरक्षा कारणों से  इस जाँच चौकी से नही पार हो सकता | &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अब मैं और पुर्नेंदु भाई जी और मैं गाड़ी से उतर कर चौकी अधिकारी के पास गए और उनसे निवेदन किया हम दिल्ली से आये है और हमारी संस्था यंग उत्तराखंड को ओर से हम प्रतापनगर में फ्री मेडिकल कैम्प का आयोजन करवा रहे है और उनको यह अवगत करवाया की हमारा सुबह ८ बजे प्रतापनगर पहुचना बहुत आवश्यक है | जांच अधिकारी बहुत भला आदमी था हमारी बातो को उन्होंने समझा और गंभीरता से निर्णय लेकर हमारी जाँच कर हमें जाँचचौकी पार करने का मौका दिया | वैसे भी स्पेशल डयूटी वाले हमारे पुर्नेंदु भाई जी हमारे साथ थे तो हमें किस बात का डर था | &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अब हम ५.१० पर चम्बा के नजदीक सेलुपनी पहुच गए | ठण्ड के मारे सभी का बुरा हाल था , सेलुपनी पहुच कर अब हमारे अध्यक्ष महोदय जी को जंगल जाने (पेट खाली करने) की सूझी | वहा के लोगो ने बताया की आजकल यहाँ पर आदमखोर बाघ (मन्ख्या बाघ ) का आतंक है सो मैं, पंवार जी और पांथरी जी भी उनके साथ हो लिए (उनके अंगरक्षक बन कर) हमने सोचा की उनका अकेला जंगल जाना ठीक नही है | बड़ी मुश्किल से साहब जी का पेट खाली हुआ तो हम अब अपनी आगे की यात्रा को पूरा करने की लिए निकल पड़े |&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अब हम ठीक ५.४५ पर चम्बा पहुच गए | चम्बा में एक और सदस्य श्री बलबीर राणा जी मेडिकल कैम्प में जाने हेतु हमारी प्रतीक्षा बस अड्डे पर कर रहे थे | हमने उनको अपने साथ लिया और हम अब निकल पड़े | &lt;br /&gt;रस्ते में जगह जगह सड़क टूटी हुई थी, सड़कों में बड़े बड़े गड्ढे थे | मेरे, विपिन भाई जी और राणा जी के थिचोड़- थिचोड़ (उछल-उछल) के बुरे हाल हो गए थे | &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भोर हो चुकी थी , देवभूमि के प्राकृतिक सौन्दर्य की छटा चारो ओर बिखरी हुई थी | चिड़िया भी अपना प्रात:काल का गुंजन कर रही थी चारो ओर वातावरण में सुगन्धित महक बिखरी हुई थी जो की मन-मष्तिष्क में घर कर रही थी | ऐसा नजारा देख कर रास्ते के सारी थकान मनो उतर सी गई हो |&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सहसा किसी सदस्य के खुरापाती दिमाग में एक आइडिया आया की हम टिहरी डैम के ऊपर बनी रोड से जायेगे, यदि हम इस रोड से जा पाते तो हमें करीब २५ किलोमीटर की यात्रा काम करनी पड़ती , लेकिन यहाँ पर मैं आप सभी को बताना चाहूँगा की टिहरी डैम के ऊपर बनी रोड से केवल तभी जा सकते है जब आप के पास किसी राजकीय अधिकारी या टिहरी डैम के किसी वरिष्ठ अधिकारी द्वारा जरी किया गया पास या आज्ञा पत्र हो | वो हमारे पास तो नही था ,हमारे पास तो थे बस एक स्पेशल डयूटी वाले ऑफिसर (हमारे पुर्नेंदु भाई ) जैसे कैसे कर उनको जगाया गया, वो सुरक्षा गार्ड के पास गए तो उसने पास न होने के आभाव में हमें वहा से नही जाने दिया |  हमने फिर डैम के आसपास के कुछ नजरो को अपने कैमरे में कैद किया और निकल पड़े प्रतापनगर की ओर |&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;करीब ७.४५ पर हम पीपलडाली पहुचे | हमें कैम्प में देरी का अंदेशा सताने लगा सो हमें पीपलडाली में बिना जलपान किए आपनी यात्रा आगे बढाई | पीपलडाली का लगभग ५०० मीटर झुला-जीप-पुल पार करने के बाद हम टिहरी झील के दूसरी ओर आ गए | यहाँ से यह रोड़ धारकोट होते हुए प्रतापनगर को जाती है | यह मार्ग बहुत ही संकरा और दुर्गम है | पीपलडाली से १५ किलोमीटर सड़क ठीक ठाक है परन्तु उसके बाद तो जैसे सड़क नही खड़ीन्जा वाली सड़क आ गई हो | फिर क्या था शुरू हो गई हमारी थिचोडम थिचोडाई |   जैसे तैसे हम अपना सफर करते हुए प्रतापनगर पहुचे |&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हमारे साथ गए एस्कोर्ट हास्पिटल के चिकित्सक -दल के रहने व खाने पीने की व्यस्था धारकोट के एक होटल में की गई थी | धारकोट से प्रतापनगर गाड़ी से ३० मिनट का रास्ता है |&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;प्रतापनगर में टीम का आगमन &lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हम सुबह 10.15 बजे सभी विपिन जी के घर पहुचे | वहा से प्रतापनगर हास्पिटल करीब ५ किलीमीटर है ,यही पर मेडिकल कैम्प का आयोजन किया जाना तय था |  टीम की रहने, खाने-पीने की व्यवस्था सब इन्ही के घर में थी | मैं यहाँ पर विपिन जी के सभी घर वालो का बहुत आभारी हूँ जिन्होंने ने हमें अपने बच्चो की तरह प्यार -दुलार व हमारा हर जरुरत का ख्याल रखा | विपिन पंवार जी की माताजी, पिताजी , बहिन व भुला की बुआरी ने (जो की ग्राम प्रधान है ) ने सबका बहुत ख्याल रखा | हमें ऐसा लगा जैसे हम अपने माता -पिता  व भाई बहिनों के साथ अपने ही घर पर है | किसी भी टीम मैम्बर को किसी भी परेशानी का सामना नही करना पड़ा | विपिन जी के चचेरे भाई श्री राजपाल भाई जी और आशीष (जो की इस कोम्प के सबसे काम उम्र के कार्यकर्ता थे ) ने भी इस कैम्प में अपना हर सम्भव योगदान दिया | विपिन जी के समस्त परिवार वास्तव ने इस कैम्प को सफल बनाने में महतवपूर्ण भूमिका निभाई | &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;विपिन जी के घर पहुचने के बाद हम सभी फ्रेश हुए , तब तक रसोई से कोदे (मंडवा) की रोटी, हरी सब्जी , घी, और आलू के परोंठे परोस दिए गए | सभी ने बड़े चाव से खाया .....कैम्प में देर हो रही थी ....सबको जल्दी थी ....कुछ लोगो ने मुझे पूरा खाना भी नही खाने दिया .........खैर हम सड़क तक पैदल गए और अपनी गाड़ी में बैठ कर मेडिकल कैम्प के आयोजन स्थल को रवाना हो गए |&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;मेडिकल कैम्प में टीम का आगमन&lt;/strong&gt; &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हमारे साथ साथ एस्कोर्ट हास्पिटल का समस्त चिकित्सक दल भी पंहुचा | दिनांक २९-११-२००८ को कैम्प 11 बजे शुरू हुआ | वहा के स्थानीय कार्यकर्ताओ और प्रतापनगर हास्पिटल के स्टाफ ने कैम्प  शुरू होने से पहले होने वाले सभी कार्य पूरे कर लिए थे | &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;स्वागत व शुभारम्भ&lt;/strong&gt; &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस कैम्प के मुख्या अथिति ब्लाक प्रमुख श्री पूरनचंद रमोला जी ने जेयेष्ठ प्रमुख श्री राजेन्दर प्रशाद भट्ट , ग्राम प्रधान श्रीमती सीमा पंवार जी , प्रिंसिपल श्री सरोप सिंह पंवार जी, हमारे अध्यक्ष श्री पुर्नेंदु चौहान जी, डाक्टर पीयूष जैन जी व डाक्टर निशांत जी व अन्य यंग उत्तराखंड टीम की उपस्तिथि में अपने हाथो से रिब्बन काट कर तथा वैदिक मंत्रोच्चार व आरती वाचन कर मेडिकल कैम्प शुभारम्भ किया |  &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;मेडिकल कैम्प में कार्यवाही &lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इसके बाद सब अपने अपने कामो में लग गए | श्रीमती पूनम चौहान जी व अशिशी पंथारी जी  मरीजो  का पंजीकरण का कार्य शुरू किया | वरिष्ठ चिकित्सक श्री पीयूष जैन जी ने अपने सहयोगी चिकित्सक श्री निशांत जी ने अलग अलग मरीजो की जाँच करनी शुरू की व उनकी समस्याओ को सुनकर उनका निदान किया | एस्कोर्ट हास्पिटल के प्रोग्राम ऑफिसर श्री संदीप गोदियाल जी ने इस मेडिकल कैम्प में सराहनीय योगदान दिया | भीतर के कमरों में कही मरीजो का ई. सी. जी. परीक्षण हो रहा था तो किसी कमरे में उनका इको- कार्डियो की जाँच हो रही थी | श्रीमती सौम्या व उनकी अन्य सहयोगी मरीजो का रक्तचाप नाप रही थी | रक्तचाप नाप के बाद सभी मरीज डाक्टर्स के पास अपना पर्चा ले कर जा रहे थे | डाक्टर की टेबल के समीप खड़े होकर मैंने, विपिन जी व बीनू भाई जी, पुर्नेंदु भाई ने मरीजो की पहाड़ी बोली को हिन्दी में डाक्टर्स को बता कर उनकी सहायता की |इस मेडिकल कैम्प में लगभग ३०० मरीजो की जाँच की गई तथा लाभान्वित हुए |&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस दिन हमने कैम्प का समापन लगभग सायं ४ बजे कर दिया | इसके बाद यंग उत्तराखंड कैम्प टीम ने पूर्वनिर्धारित कार्यक्रम के अनुसार हमारे सदस्य श्री धनी राम जोशी जी के गाव गए | उनसे मिल कर उन्हें सान्तवना व उनके मृतक परिजनों को श्रधान्जली दी व शोक संतप्त परिवार तथा जोशी जी को समझाया |&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इसके बाद टीम लम्बगाव गई जहा हमने गाड़ी के लिए डीजल व रास्ते में हुए टायर के पंचर को ठीक करवाया |&lt;br /&gt;वापिस आते समय हमने रास्ते में एक देसी मुर्गा पकड़ा जिसको हमने मांजफ गावं के एक होटल में बनवाया और उसको वही पर खाया | वहा से अब वापिस विपिन जी के घर को चले जहा पर हमारे रहने व खाने -पीने की व्यवस्था थी | रात का खाना खा कर हम सब सो गए |&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;मेडिकल कैम्प में कार्यवाही का अगला दिन&lt;/strong&gt; &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अगले दिन ३०-११-२००८ को सुबह तैयार हो कर हम सब फिर से प्रतापनगर चल पड़े | पहले दिन की भांति सब काम पूरा कर हम ने समापन समारोह का आयोजन किया | जिसमे विपिन पंवार जी ने एस्कोर्ट हास्पिटल के प्रमुख चिकित्सक श्री पीयूष जैन जी को स्मृति चिन्ह भेट कर उनका स्वागत किया व इस कैम्प के सफल आयोजन के लिए उनका हार्दिक धन्यवाद् किया | &lt;strong&gt;इसके बाद श्री विजय बुटोला जी ने के मुख्य अथिति ब्लाक प्रमुख श्री पूरनचंद रमोला जी  को स्मृति चिन्ह भेट कर उनका स्वागत किया व इस कैम्प के सफल आयोजन के लिए उनका हार्दिक धन्यवाद् किया |&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_HvC2cLQkeYw/SVhf6WNUXJI/AAAAAAAAAEI/B1bPSQRMhGA/s1600-h/57.jpg"&gt;&lt;img style="cursor:pointer; cursor:hand;width: 400px; height: 300px;" src="http://4.bp.blogspot.com/_HvC2cLQkeYw/SVhf6WNUXJI/AAAAAAAAAEI/B1bPSQRMhGA/s400/57.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5285079618717768850" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इसके बाद श्री विजय कुकरेती जी ने प्रिंसिपल श्री सरोप सिंह पंवार जी को स्मृति चिन्ह भेट कर उनका स्वागत किया व इस कैम्प के सफल आयोजन के लिए उनका हार्दिक धन्यवाद् किया |&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस दिन हमें कैम्प लगभग एक बजे संपन कर दिया | डाक्टर्स की टीम वापिस दिल्ली रवाना हो गई | अब हमारी टीम की मस्ती करने का समय था सो पहले हम प्रतापनगर के राजा श्री प्रताप शाह के असंरक्षित महल, कोर्ट  व अन्य सांस्कृतिक धरोहरों को देखने गए | &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;एक सच्चे उत्तराखंड क्रन्तिकारी से मुलाकात &lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कोर्ट के बाहर हमें एक वृद्ध सज्जन मिले जिनका नाम बिशनपाल सिंह "उत्तराखंडी" था | इन्होने हमें बताया की सन १९५० से ये प्रथक उत्तराखंड के माग को लेकर इन्होने कई आन्दोलनों में भाग लिया कई बार जेल की यात्राये की | लेकिन हमें तब बहुत बुरा लगा की आज उनके दोनों गुर्दे खरब हो चुके है और कोई भी उनकी सुध लेने को तैयार नही है | उनसे हमरी टीम की लगभग आधे घंटे बातचीत हुई उन्होंने हमें बताया की जिस उत्तराखंड का सपना हमने देखा था ये वो नही था | आज जो सच्चे उत्तराखंडी क्रन्तिकारी है उनका कही कोई जिक्र नही है और उन्हें किसी भी प्रकार की कोई भी राजकीय सहायता नही प्राप्त हो रही है | ये बड़े दुःख की बात है |  &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;दिल्ली वापसी का सफर &lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इसके बाद हमने वापिस दिल्ली के लिए कुछ किया | प्रतापनगर में चलते समय मेरे खुरापाती दिमाग में एक विचार आया की क्योँ न हम सब प्रतापनगर से धारकोट पैदल जंगल से ट्रेकिंग कर के जाए ? परन्तु कुछ आलसी सदस्यों ने मन कर दिया फिर केवल बीनू भाई, विपिन जी, मनीष जी, आशीष भाई और मै ही पैदल जंगल के दुर्गम रास्तो से होते हुए ९ किलोमीटर पैदल यात्रा कर डेढ़ घंटे में धारकोट पहुचे ,जहा बाकी आलसी सदस्य हमारा इंतजार कर रहे थे वो भी सोते हुए |&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हम पीपल डाली के लिए रवाना हुए वही पर हमने मच्छी-भात खाया | यहाँ पर भी हमारे आलसी साथियों ने मुझे भरपेट खाना नही खाने दिया और मैंने होटल वाले को एक हाथ से दिए और दुसरे हाथ से मछली की बोटी को खा रहा था ....चलते चलते | अब तक शाम के ६ बज चुके थे |&lt;br /&gt;अब हम चम्बा ८.०० बजे पहेचे ,वापसी में हमने चम्बा में जलपान किया और निकल पड़े | वापिस फिर से सेलुपानी में पुर्नेंदु भाई का पेट ख़राब हो गया शायद वो मछली भात ज्यादा खा गए थे सो फिर उनके साथ जाना पड़ा ,जंगल में | ऋषिकेश हम १०.०० बजे पहुचे  | मुजफ्फरनगर हम करीब रात १२.३० बजे खाना खाया फिर वापिस दिल्ली को चल पड़े | हम सब सुबह ३ बजे दिल्ली पहुच चुके थे | उसके बाद ड्राइवर ने सभी को उनके घरो पर छोड़ा | &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;इस प्रकार इस  मेडिकल कैम्प सफलता पूर्वक संपन्न हुआ | हम सभी ने समाज सेवा के साथ साथ इस कैम्प में भरपूर आनंद लिया | मेरे जीवन में यह यात्रा सदा एक यादगार रहेगी | &lt;br /&gt;मैं यहाँ पर उन सभी व्यक्तियों का धन्यवाद प्रकट करता हूँ जिन्होंने इस सफलता पूर्वक संपन्न हुए  कैम्प में अपना प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष रूप से अपना भरपूर योगदान दिया |&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;लेखक : विजय सिंह बुटोला &lt;br /&gt;दिनांक 04-12-2008.&lt;/strong&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5621615689103488557-3318256038695911078?l=butolavijay.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://butolavijay.blogspot.com/feeds/3318256038695911078/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=5621615689103488557&amp;postID=3318256038695911078' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5621615689103488557/posts/default/3318256038695911078'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5621615689103488557/posts/default/3318256038695911078'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://butolavijay.blogspot.com/2008/12/29-30-2008-28-11-2008-730-700-715-108-c.html' title='यंग उत्तराखंड द्वारा आयोजित दो दिवसीय निशुल्क: स्वास्थ्य परीक्षण शिविर (प्रतापनगर, टिहरी गढ़वाल)'/><author><name>Vijay Singh Butola</name><uri>http://www.blogger.com/profile/10701971246743120104</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='31' height='32' src='http://3.bp.blogspot.com/_HvC2cLQkeYw/SXla3t65CLI/AAAAAAAAAEw/luftISiSRhs/S220/Copy+of+000_0903.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/_HvC2cLQkeYw/SVhpFWeKpVI/AAAAAAAAAEQ/r7hyZOt3HGY/s72-c/71.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5621615689103488557.post-4356422359561853361</id><published>2008-10-31T12:08:00.002+05:30</published><updated>2008-10-31T12:21:47.181+05:30</updated><title type='text'>उत्तराखंड के चार धाम (गढ़वाली भाषा में एक निबंध)</title><content type='html'>&lt;p&gt;प्रिय उत्तराखंडी मित्रो, सादर प्रणाम &lt;/p&gt;&lt;p&gt;मैं यख उत्तराखंड का  चार धाम यात्रा का बारा मा एक निबंध लिख्णु छोऊ  आप सभी जाणदा छन की हमारा उत्तराखंड मा मई बीटी चार धम यात्रा कु शुभारम्भ ह्वे जांदु, यन पवित्र यात्रा का बार मा मैं अप्नु यू छोटू सी प्रयास आपका सामणी अपनी पहाड़ी भाषा मा प्रस्तुत कर्णु छोउं &lt;/p&gt;&lt;p&gt;चार धाम यात्रा की उत्त्पत्ति का बारा मा यन त कुई निश्चित मान्यता या साक्ष्य उपलब्ध नि च परन्तु चार धाम यात्रा भारत का चार धार्मिक स्थलों कु समूह च  येका अंतर्गत भारत की चार दिशाओ का वो सब्भि मंदिर ओऊँदा  इ मंदिर छन- पूरी, रामेवश्रम, द्वारका और श्री बद्रीनाथ यू मंदिरों कु निर्माण ८ वीं शताब्दी मां आदि गुरु शंकराचार्य जी न करवाई कें एक सूत्र मा पिरोई थोऊ  लेकिन यूँ सभी मंदिरू मा श्रीबद्रिनाथ जी कु अधिक महत्व च  येका दगडी उत्तराखंड मा और ३ मंदिर भी छन , जन की श्रीकेदारनाथजी , गंगोत्री जी अऔर् यमनोत्री जी  इ सभी मंदिर हिमालय पर स्थित चार दाम का समूह छन  यू चारों मंदिरों कु विवरण ये प्रकार सी छ  &lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color:#ff0000;"&gt;श्री बद्रीनाथ मंदिर&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;- &lt;span style="color:#3333ff;"&gt;यू मंदिर उत्तराखंड का चमोली जिला मा समुद्र तल सी १०२७६ फीट (३१३३ मीटर ) की ऊंचाई पर अलकनंदा नदी का तट पर नर और नारायण पर्वतों का मध्य मा स्थित छा  यां मान्यता छ की भगवान् श्री लक्ष्मीनारायण जी याख विराजमान छन देवी लक्ष्मी न भगवान् थीं चाय प्रदान करण का वास्ता याख बेर (बदरी ) वृक्ष कु रूप लीनी थोऊ तब सी इ जगह की नोउ बद्रीनाथ पड़ी जी थोऊ आज जू मंदिर हम लोग देख्दा छन व्येकू निर्माण १८ वी शताब्दी मा गढ़वाल का राजा द्वारा शंकु शैली मा कराइ गयी थोऊ  ये मंदिर की ऊंचाई १५ मीटर छ, शिखर पर गुम्बज व यख १५ मूर्तिया छन  मंदिर का गर्भ गृह मा विष्णु भगवान् दागडी नर और नारायण ध्यान अवस्था मा विराजमान छन  यन मान्यु जंदु की येकू निर्माण वैद्क काल मा हवाई थोऊ परन्तु बाद मा पुनुरुधार शंकराचार्य जी न ८ वी शताब्दी मा करवाई थोऊ  मद्निर का तीन भाग छन - गर्भ गृह , दर्शन मंडप और सभा गृह  वेदों और ग्रंथो में यन वर्णन छ की ----"स्वर्ग और पृथ्वी पर अनेक पवित्र स्थान छन, लेकिन श्री बद्रीनाथ यूँ सभी मा सर्वोपरि छ  &lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;span style="color:#3333ff;"&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color:#ff0000;"&gt;श्री केदारनाथ जी&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;- &lt;/span&gt;&lt;span style="color:#cc33cc;"&gt;यू मंदिर उत्तराखंड का चमोली जिला मा समुद्र तल सी 1982 मीटर की ऊंचाई पर मंदाकनी नदी का तट पर भगवान शिव जी का निवास का रूप मा स्थित छा यू मंदिर उत्तराखंड कु सबसे विशाल मंदिरों मा एक छा जू भूरे कटवा पथरो के विशाल शिलाखान्डो को जोड़ कर ६ फुट ऊँचा चबूतरा पर बनायु च  ये मंदिर कु निर्माण भी १२-१३ वी शताब्दी मा करवाई गई थोऊ मंदिर का गर्भ गृह मा अर्धा का पास चार स्तंभ छन  एक सभा मंडप भी छ एकी छत चार विशाल स्तंभों पर टिकी च  यख विभिन्न प्रकार का देवी देवताओ की मूर्ति च मंदिर का पिछाडी पथ्थरो कु ढेर च जैक पीछाडी शंकराचार्य जी की समाधि च श्रद्धालु यख गंगोरती और यम्नोरती बीटी जल लौंदा और श्रीकेदारेश्वर पर जलाभिशेख करदा छन यात्रा कु मार्ग ये प्रकार सी छा ----------हरिद्वार-ऋषिकेश-चम्बा -धरासु -यमनोत्री-उत्तरकाशी-गंगोत्री-त्रियुगिनारायण-गौरिकुंद-केदारनाथ  यू मार्ग परम्परात हिन्दू धर्म मा ह्वान वाली पवित्र परिकर्मा का समान छा  &lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;श्री गंगोत्री&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;- &lt;span style="color:#ff6600;"&gt;गंगोत्री उत्तराखंड का उत्तरकाशी जिला मा ९९८० फीट (३१४० मी. ) की ऊंचाई पर भागीरथी नदी का तट पर बस्यु पवित्र देवी मंदिर च जू की हिमालया/उत्तराखंड का चार धामो मा एक धाम छा  गंगोत्री मा भागीरथी नदी थै गंगा नाम सी भी जान्यु जंदु पौराणिक कथाओ का अनुसार राजा भागीरथ तपस्या करिकैं गंगा माता थें धरती पर लाई था यख वासुकी ताल, गुग्गल कुण्ड, भीम गुफा, भीम्पुल, सरस्वती उद्गम, भीम्शिला, व चैरव नाथ जी का मंदिर है  उत्तराखंड म भैरोनाथ क्षेत्रपाल देवता व भूमि देव के रूप में प्रचलित और महत्वपूर्ण छन  गंगोत्री भारत का पवित्र और अध्यात्मिक रूप सि महत्वपूर्ण नदी गंगा कु उद्गम स्थल भी च ई गंगा नदी गौमुख बटी निकल्दी छा यन मान्यु जंदु की १८ वी शताब्दी मा गोरखा कैप्टन अमर सिंह थापा न शंकराचार्य जी का सम्मान मा ये मंदिर कु निर्माण करवाई थोऊ बाद मा राजा माधो सिंह न १९३५ मा ये मंदिर कु पुनुरुधार करवाई थोऊ मंदिर सफेद दुंगो कु बन्यु च ,मंदिर की ऊंचाई २० फीट च मंदिर का नजदीक भागीरथी शिला भी च जै पर बैठी कें राजा भागीरथ ने तपस्या करी थै ये मंदिर मा देवी गंगा का अलावा देवी यमुना ,भगवान् शिव , देवी सरस्वती, अन्नान्पुर्ना और महागौरी की पूजा विशेष रूप सि होदी च  &lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;span style="color:#3333ff;"&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color:#009900;"&gt;श्री यमनोत्री&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;- &lt;/span&gt;&lt;span style="color:#cc33cc;"&gt;यमनोत्री धाम उत्तराखंड का उत्तरकाशी जिला मा पशिचिमी किनारा पर बांदरपूँछ पर्वतमाला ,३२९१ मीटर की ऊंचाई पर स्थित च  पौराणिक कथाओ का अनुसार यमुना सूर्य चाग्वान की बेटी थै और यम् उंकू पुत्र थोऊ ये वजह सी ये मंदिर कु नाम यम्य्नोत्री पड़ी यमुना कु उदगम स्थल यमुनोत्री सी एक किलोमीटर अगने ४४२१ मीटर की ऊंचाई पर यमुनोत्री ग्लेशियर पर स्थित च परंपरागत रूप सी यमुनोत्री चार धाम कु पहलू पड़ाव च  हनुमान चट्टी सी १३ किलोमीटर उकाल चड़ना का बाद यमुनोत्री धाम औंदु  यमुनोत्री मा कई ताता पाणी का कुंद छन, यू सभी कुंडू मा सूर्य कुंद परसिद्ध च  श्रद्धालु ये कुंड मा चौळ (चावल) और आलू कपडा मा बंधी कै छोड़ देंदा न , बाद म पक्य्नु भात श्रद्धालु प्रशाद का रूप मा आपण घर ली जांदा  सूर्य कुंड का पास मा एक शिला च जैकैं दिव्या शिला का नाम सी जन्यु जंदु ,सभी तीर्थयात्री यमुना जी की पूजा करण सी पैली इ शिला की पूजा करदा छन यमुनोत्री का पुजारी यख पूजा कन खर्सला गौं बाटी अंदा छन  यमुनोत्री कु मंदिर नवम्बर सी मई महीना तक ख़राब मौसम का वजह सी बंद रंदु &lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;span style="color:#6600cc;"&gt;मिथें पुरु विश्वास च की अपणी पहाड़ी भाषा मा उत्तराखंड का पवित्र तीर्थस्थल का बार मा मेरी यू छोटू सी प्रयास आप थै पसंद आलू  यदि ये निबंध मा कुछ आवश्यक जानकारी छुटी गे होली त आप मीथें  क्षमा करया &lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;प्रणाम &lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;span style="color:#ff0000;"&gt;विजय सिंह बुटोला&lt;/span&gt;  &lt;/p&gt;&lt;p&gt; &lt;/p&gt;&lt;p&gt; &lt;/p&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5621615689103488557-4356422359561853361?l=butolavijay.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://butolavijay.blogspot.com/feeds/4356422359561853361/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=5621615689103488557&amp;postID=4356422359561853361' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5621615689103488557/posts/default/4356422359561853361'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5621615689103488557/posts/default/4356422359561853361'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://butolavijay.blogspot.com/2008/10/blog-post_7784.html' title='उत्तराखंड के चार धाम (गढ़वाली भाषा में एक निबंध)'/><author><name>Vijay Singh Butola</name><uri>http://www.blogger.com/profile/10701971246743120104</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='31' height='32' src='http://3.bp.blogspot.com/_HvC2cLQkeYw/SXla3t65CLI/AAAAAAAAAEw/luftISiSRhs/S220/Copy+of+000_0903.jpg'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5621615689103488557.post-8265861117010080433</id><published>2008-10-25T15:49:00.007+05:30</published><updated>2009-01-14T13:31:55.694+05:30</updated><title type='text'>मेरी जन्मभूमि</title><content type='html'>&lt;span style="color:#993399;"&gt;दोस्तो इस कविता मैंने अपनी जन्मभूमि का वर्णन किया है&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#ff0000;"&gt;है जन्मभूमि स्वर्ग से भी महान &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#ff0000;"&gt;हम करे न्योछावर इसपर तन ,मन और प्राण &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#ff0000;"&gt;इसके आस्तित्व से ही है हमारी पहचान &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#ff0000;"&gt;बढे मिलकर हम यही हो बस मन में अरमान&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#000099;"&gt;हो संगठित और समर्पित इसे संवारे &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#000099;"&gt;निस्वार्थभावः कर्म कर इसे निखारे &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#000099;"&gt;चिर-यौवना रहे सदा ये धारा ऐसा कुछ विचारे &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#000099;"&gt;हमारी यह धारा हमे निस दिन यही पुकारे&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#cc33cc;"&gt;हे जन्मभूमि तुझे हम सर्वस्व अर्पण करे &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#cc33cc;"&gt;अभिलाषा है हमारी सर्व कर्म समर्पण करे &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#cc33cc;"&gt;है हमारे रक्त मे समाहित तेरी ही महक &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#cc33cc;"&gt;तेरे लिए कर्म करू ,कम है जो प्राण भी तरु&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#ff0000;"&gt;इस धारा के प्रताप पाई हमने जग मे पहचान &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#ff0000;"&gt;निष्काम भाव से कर्म कर दे हम अपना योगदान &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#ff0000;"&gt;इसकी माटी मे जन्मे बना हमारा आधार &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#ff0000;"&gt;बिसराये इस धारा को यही है समय की पुकार&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भवदीय,&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#cc33cc;"&gt;विजय सिंह बुटोला&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#009900;"&gt;पब्लिक रिलेशन ऑफिसर&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#3333ff;"&gt;यंग उत्तराखंड (पंजीकृत) &lt;/span&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5621615689103488557-8265861117010080433?l=butolavijay.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://butolavijay.blogspot.com/feeds/8265861117010080433/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=5621615689103488557&amp;postID=8265861117010080433' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5621615689103488557/posts/default/8265861117010080433'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5621615689103488557/posts/default/8265861117010080433'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://butolavijay.blogspot.com/2008/10/blog-post.html' title='मेरी जन्मभूमि'/><author><name>Vijay Singh Butola</name><uri>http://www.blogger.com/profile/10701971246743120104</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='31' height='32' src='http://3.bp.blogspot.com/_HvC2cLQkeYw/SXla3t65CLI/AAAAAAAAAEw/luftISiSRhs/S220/Copy+of+000_0903.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5621615689103488557.post-3641630752247261842</id><published>2008-10-25T12:28:00.002+05:30</published><updated>2008-10-31T12:43:38.189+05:30</updated><title type='text'>मेरु और मेरी जन्मभूमि कु दर्द (गढ़वाली भाषा में कविता)</title><content type='html'>&lt;span style="color:#cc33cc;"&gt;मन च आज मेरु बोलंण लग्युं जा &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#cc33cc;"&gt;घर बौडी जा तौं रौत्याली डंडी कांठियों मा &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#cc33cc;"&gt;मेरु मुलुक जग्वाल करणु होलू &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#cc33cc;"&gt;कुजणी कब मैं वख जौलू कब तक मन कें मनौलू&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;अपणा प्राणों से भी प्रिय छ हम्कैं ई धारा &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;किलै छोड़ी हमुन वु धरती किलै दिनी बिसरा &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;इं मिट्टी माँ लीनी जन्म यखी पाई हमुन जवानी &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;खाई-पीनी खेली मेली जख करी दे हमुन वु विराणी&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#006600;"&gt;हमारा लोई में अभी भी च बसी सुगंध इं मिट्टी की &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#006600;"&gt;छ हमारी पछाण यखी न मन माँ राणी चैन्दि सबुकी &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#006600;"&gt;देखुदु छौं मैं जब बांजा पुंगडा ढल्दा कुडा अर मकान &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#006600;"&gt;खाड़ जम्युं छ चौक माँ, कन बनी ग्ये हम सब अंजान&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#cc33cc;"&gt;याद ओउन्दी अब मैकि अब वु पुराणा गुजरया दिन &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#cc33cc;"&gt;कन रंदी छाई चैल पैल हर्ची ग्यैन वु अब कखि नी छिंन&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;याद बौत औंदन  वू प्यारा दिन जब होदू थौं&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#ff6600;"&gt;काली चाय मा गुडु कु ठुंगार &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#ff6600;"&gt;पूषा का मैना चुला मा बांजा का अंगार &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#ff6600;"&gt;कोदा की रोटी पयाजा कु साग &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#ff6600;"&gt;बोडा कु हुक्का अर तार वाली साज&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#cc33cc;"&gt;चैता का काफल भादों की मुंगरी &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#cc33cc;"&gt;जेठा की रोपणी अर टिहरी की सिंगोरी &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#cc33cc;"&gt;पुषों कु घाम अषाढ़ मा पाक्या आम &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#cc33cc;"&gt;हिमाला कु हिंवाल जख छन पवित्र चार धाम&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#ff0000;"&gt;असुज का मैना की धन की कटाई &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#ff0000;"&gt;बैसाख का मैना पूंगाडो मा जुताई &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#ff0000;"&gt;बल्दू का खंकार गौडियो कु राम्णु &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#ff0000;"&gt;घट मा जैकर रात भरी जगाणु&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#3333ff;"&gt;डाँडो मा बाँझ-बुरांश अर गाडियों घुन्ग्याट&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#3333ff;"&gt;डाँडियों   कु बथऔं गाड--गदरो कु सुन्सेयाट &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#3333ff;"&gt;सौंण भादो की बरखा, बस्काल की कुरेडी &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#3333ff;"&gt;घी-दूध की परोठी अर छांच की परेडी&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#660000;"&gt;हिमालय का हिवाँल कतिकै की बगवाल&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#660000;"&gt;भैजी छ कश्मीर का बॉर्डर बौजी रंदी जग्वाल &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#660000;"&gt;चैता का मैना का कौथिग और मेला &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#660000;"&gt;बेडू- तिम्लौ कु चोप अर टेंटी कु मेला&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#ff0000;"&gt;ब्योऊ मा कु हुडदंग दगड़यो कु संग &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#ff0000;"&gt;मस्क्बजा की बीन दगडा मा रणसिंग &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#ff0000;"&gt;दासा कु ढोल दमइया कु दमोऊ &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#ff0000;"&gt;कन भालू लगदु मेरु रंगीलो गढ़वाल-छबीलो कुमोऊ&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#6600cc;"&gt;बुलाणी च डांडी कांठी मन मा उठी ग्ये उलार&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#6600cc;"&gt;आवा अपणु मुलुक छ बुलौणु हवे जावा तुम भी तैयार&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#cc33cc;"&gt;रचियेता: विजय सिंह बुटोला&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;25-10-2008&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5621615689103488557-3641630752247261842?l=butolavijay.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://butolavijay.blogspot.com/feeds/3641630752247261842/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=5621615689103488557&amp;postID=3641630752247261842' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5621615689103488557/posts/default/3641630752247261842'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5621615689103488557/posts/default/3641630752247261842'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://butolavijay.blogspot.com/2008/10/25-10-2008_24.html' title='मेरु और मेरी जन्मभूमि कु दर्द (गढ़वाली भाषा में कविता)'/><author><name>Vijay Singh Butola</name><uri>http://www.blogger.com/profile/10701971246743120104</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='31' height='32' src='http://3.bp.blogspot.com/_HvC2cLQkeYw/SXla3t65CLI/AAAAAAAAAEw/luftISiSRhs/S220/Copy+of+000_0903.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5621615689103488557.post-8399820840766123887</id><published>2008-10-25T11:36:00.002+05:30</published><updated>2008-10-31T12:56:30.366+05:30</updated><title type='text'>एक दिन की बारात कु हाल (गढ़वाली भाषा में कविता )</title><content type='html'>&lt;span class=""&gt;प्रिय मित्रो, सादर नमस्कार,&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;प्रस्तुत हास्य कविता मैंने उत्तरांचल में आज कल प्रचलित एक दिवसीय विवाह के होने के बारे में लिखी है&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#cc33cc;"&gt;एक बार दगडियो&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#3333ff;"&gt;मैके भी दिन दिन की बारात माँ जाणा कु मौका मिली&lt;br /&gt;चल दगडियो का संग मन प्रसन्न मुखुडी को रंग तब खिली&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#ff0000;"&gt;झटपट हवे गे वरनारायण तैयार&lt;br /&gt;पैरी वें सूट बूट आर टांगी कमर माँ तलवार&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#006600;"&gt;सड़की माँ गाड़ी थाई खड़ी मारनी छाई होरण&lt;br /&gt;ढोल दमौं मसकबिन संग बाजणा था रणसिंघा-तोरण&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#cc33cc;"&gt;बारात पहुची सड़की माँ सबुन अपनी सीट खुजाई&lt;br /&gt;वरनारायण कु मामा आर दही की परोठी घर छुटी गयाई&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="color:#009900;"&gt;&lt;span class=""&gt;चली ग्ये &lt;/span&gt;बारात डांडी-कंठियो माँ होण च गाड़ी कु सुन्स्याट&lt;br /&gt;सभी पौणा बन्या चन दारू माँ रंग मस्त करना चन खिक्लीयाट&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#3333ff;"&gt;बारात ज़रा रुकी बीच बाजार &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#3333ff;"&gt;दरौल्या पहुची ठेका माँ रुपया लेकी हजार&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#ff0000;"&gt;चल पड़ी गाड़ी कुई छुटी गे होटल माँ कुई छुटी धार पोर&lt;br /&gt;दरोलिया दिदो कु त छोऊ बस बोतली पर शोर&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#cc33cc;"&gt;बारात पहुची चौक माँ होण लगी गे स्वागत&lt;br /&gt;कुई बैठी कुर्शी माँ कुई बैठी दरी माँ अर कुई बैठी छत&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="color:#3333ff;"&gt;जवान छोरा खोजना छन, गलेर नौनी कुजणी कख हर्ची गे&lt;br /&gt;बोलना छन की अब नि राये वू रंगत जू पैली छाई&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#33cc00;"&gt;बैठी पौणा पंगत माँ खाई उन काचू भात&lt;br /&gt;दाल माँ लोण भिन्डी ह्व्वे गे अब बोन क्या बात&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#ff6600;"&gt;कखी नि मिली पानी कखी नि मिली सौंफ-मिश्री&lt;br /&gt;हे हिमाला की हव्वे यु हम सब संस्कार बिसरी&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#ff0000;"&gt;बामण दीदा न पढ़ी सटासट अपना मंत्र&lt;br /&gt;ब्यौला का कंदुड़ माँ वैन बोली तब यन्त्र&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#6600cc;"&gt;फेरा फेरी सरासर ब्यौली च रेस लगाणी&lt;br /&gt;ब्यौला दीदा पिछने रेगे, ब्यौली नी छौंपी जाणी&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#009900;"&gt;पैटी बारात ब्यौली अब नी जयादा रोंदी दिखेंदी&lt;br /&gt;डोला माँ बैठी जे ब्यौली बव्वे बुबा सबी मनौंदी&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#ff0000;"&gt;यन राइ दिदो मेरु एक दिनी की बारात कु हाल&lt;br /&gt;सब कुछ सरासर हौंदु यख यनु बणी गे कुमॉऊ-गढ़वाल&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;रचियेता: विजय सिंह बुटोला&lt;br /&gt;दिनांक 16-10-2008&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5621615689103488557-8399820840766123887?l=butolavijay.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://butolavijay.blogspot.com/feeds/8399820840766123887/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=5621615689103488557&amp;postID=8399820840766123887' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5621615689103488557/posts/default/8399820840766123887'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5621615689103488557/posts/default/8399820840766123887'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://butolavijay.blogspot.com/2008/10/16-10-2008.html' title='एक दिन की बारात कु हाल (गढ़वाली भाषा में कविता )'/><author><name>Vijay Singh Butola</name><uri>http://www.blogger.com/profile/10701971246743120104</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='31' height='32' src='http://3.bp.blogspot.com/_HvC2cLQkeYw/SXla3t65CLI/AAAAAAAAAEw/luftISiSRhs/S220/Copy+of+000_0903.jpg'/></author><thr:total>1</thr:total></entry></feed>
