मेरा परिचय

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Delhi, India
प्रिय उत्तरांचली मित्रो, आप सभी को मेरा आदर युक्त सादर सेवा भाविक नमस्कार,| मेरा नाम विजय सिंह बुटोला है | मैं मूल रूप से टिहरी गढ़वाल उत्तराखंड का निवासी हूँ | वर्तमान समय में मैं परिवार सहित दिल्ली में रहता हूँ | आज इन्टरनेट के मध्यम से हम सभी उत्तराखंडी एक दुसरे के साथ जुड़े हुए है तथा किसी न किसी रूप में उत्तराखंड की विभिन्न समाज सेवी संस्थाओ के द्वारा हम सभी वहा के जन-समुदाय के लिए अपने अपने सामर्थ अनुसार जुड़े हुए है | जिन्होंने अपने सतत प्रयासों द्वारा दुनिया भर में बसे उत्तराखंडियों को इंटरनेट के मध्यम से जोड़ा हुआ है , जहाँ हम सभी सफलतापूर्वक अपनी क्षमता और संसाधनों का विभिन्न रूपों में उत्तराखंड राज्य तथा उसके निवासियों के विकास के लिए उपयोग करते हैं |यह वास्तव में एक उत्कृष्ठ व सराहनीय प्रयास है| एक उत्तराखंडी होने के नाते मैं आप सभी से आशावान हूँ कि आपके दृढ-निश्चय और लगनशीलता से किए गए प्रयासों से ही हमारा उत्तराखंड निश्चय ही एक सम्रध व विकसित राज्य बन सकेगा |

Friday, January 31, 2014

वर्तमान उत्तराखण्ड सिनेमा (टिपण्णी)

वास्तव में उत्तराखंड की वीडियो व सी डी फ़िल्म निर्माण की दुनिया अपने आपको फ़िल्म इंडस्ट्री कहलाने लायक मंच की वो पहली सीढियाँ भी नहीं चढ़ पाया है और इस क्षेत्र से जुड़े लोग अपने आपको आज के दौर का बहुत बड़ा कलाकार और निर्देशक बता रहे हैं मेरे व्यक्तिगत मतानुसार वे लोग ही यहाँ फ़िल्म निर्माण को गर्त में धकेलने के लिए सबसे बड़े जिम्मेदार है | उसका सबसे बड़ा कारण यह भी है कि फ़िल्म निर्माण सम्बन्धी तकनीकी ज्ञान और जरूरती संसाधनों का हमारी इंडस्ट्री में अत्यधिक आभाव है | उत्तराखंड में बन रही वीडियो फिल्मे और वीडयो सी डी ने असल में उत्तराखंड में सिनेमा के बढ़ते हुए ग्राफ को अवरुद्ध किया है यहाँ यह कहना ठीक होगा की उसके बढ़ते कदमो को रोका है| यह बात तो सत्य है की जो भी लोग फिल्मे और सीडियाँ बना रहे है उनको उसकी वास्तविक लागत भी नहीं मिल पा रही है| उसके कई और बहुत से कारण है जो शायद अभी इस चर्चा की विषयवस्तु नहीं हैं | इसका सबसे बड़ा कारण है कि अनट्रेंड और अन्प्रोफेस्नल लोगो का जबरदस्ती यहाँ प्रवेश कर जाना जिन्हें फ़िल्म निर्माण का या तो तकनीकी ज्ञान नहीं है या उसके बारे में अल्प समझ रखते है| वास्तव में ये वही लोग हैं जिन्हें असल में फ़िल्म तो क्या पहाड़ और पहाड़ से जुडी परम्परा, लोक- संगीत और वाद्य यंत्रो का का भी पूरा ज्ञान भी नहीं है | आप किसी भी मंच पर कुछ गायक- गायिकाओ की सजीव प्रस्तुति को भी देख लीजिये, गायक-गायिकाओ के सुर, बोल और हाव भाव और व्यव्हार कही भी सच्ची उत्तराखंडी होना सा प्रतीत नहीं होते यही असल में वह पहली रूकावट है जो उत्तराखंड में भावी फ़िल्म निर्माण की संभावनाओ को धूमिल कर रही है | मैंने कही पढ़ा था की वास्तव में क्षेत्रीय फिल्मो का एक अपना चरित्र और अपनी एक यात्रा होती है जब भी वह अपने मार्ग से भटकती है तो वह हास्यपद बन जाती है | उत्तराखंड के कतिथ फ़िल्म निर्माता अभी जिस फ़िल्म निर्माण की परिपाटी से गुजर रहे है उस मानसिकता को तोड़ने की आवश्यकता है | जब तक उत्तराखंडी फिल्मो के निर्माण में वो परम्परागत टच नहीं आएगा और जब तक बालीवूड का जमा पहने उत्तराखंडी फिल्मो के प्रतिरूप में यहाँ परोसा जायेगा तब तक तो ये दशा नहीं सुधरने वाली और वो दिन दूर नहीं जब उत्तराखंड सिनेमा अपना असली आस्तित्व खो देगा | १९७०-८० और ९० के दशक ने बनी फिल्मो के सामने आज की फिल्मे कही नहीं टिकती जबकि आज तकनीकी संसार बहुत बड़ा हो चुका है | यहाँ यह बताना जरुरी है की ये मेरे व्यक्तिगत विचार है किसी भी व्यक्ति से इसका सीधा सम्बन्ध नहीं है | क्यूंकि मैं भी एक दर्शक हूँ ....मूक दर्शक नहीं ...........