मेरा परिचय

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Delhi, India
प्रिय उत्तरांचली मित्रो, आप सभी को मेरा आदर युक्त सादर सेवा भाविक नमस्कार,| मेरा नाम विजय सिंह बुटोला है | मैं मूल रूप से टिहरी गढ़वाल उत्तराखंड का निवासी हूँ | वर्तमान समय में मैं परिवार सहित दिल्ली में रहता हूँ | आज इन्टरनेट के मध्यम से हम सभी उत्तराखंडी एक दुसरे के साथ जुड़े हुए है तथा किसी न किसी रूप में उत्तराखंड की विभिन्न समाज सेवी संस्थाओ के द्वारा हम सभी वहा के जन-समुदाय के लिए अपने अपने सामर्थ अनुसार जुड़े हुए है | जिन्होंने अपने सतत प्रयासों द्वारा दुनिया भर में बसे उत्तराखंडियों को इंटरनेट के मध्यम से जोड़ा हुआ है , जहाँ हम सभी सफलतापूर्वक अपनी क्षमता और संसाधनों का विभिन्न रूपों में उत्तराखंड राज्य तथा उसके निवासियों के विकास के लिए उपयोग करते हैं |यह वास्तव में एक उत्कृष्ठ व सराहनीय प्रयास है| एक उत्तराखंडी होने के नाते मैं आप सभी से आशावान हूँ कि आपके दृढ-निश्चय और लगनशीलता से किए गए प्रयासों से ही हमारा उत्तराखंड निश्चय ही एक सम्रध व विकसित राज्य बन सकेगा |

Saturday, December 6, 2008

यंग उत्तराखंड द्वारा आयोजित दो दिवसीय निशुल्क: स्वास्थ्य परीक्षण शिविर (प्रतापनगर, टिहरी गढ़वाल)

दोस्तों, यंग उत्तराखंड द्वारा आयोजित दो दिवसीय निशुल्क: स्वास्थ्य परीक्षण शिविर उत्तराखंड के टिहरी गढ़वाल जनपद के प्रतापनगर ब्लाक में दिनांक 29-30 नवेम्बर 2008 को किया गया |मैं इस कैम्प को लेकर बहुत पहले से ही अत्यन्त उत्साहित था आख़िर वो घड़ी, दिन भी आ गया जब मैं घर से इस अविस्मरणीय यात्रा के लिए निकल पड़ा |

इस टीम में जाने वाले सदस्य थे



श्री पुर्नेंदु सिंह चौहान, श्रीमती पूनम चौहान, श्री विपिन पंवार, श्री विजय कुकरेती, श्री विजय सिंह बुटोला, श्री सुशील सेंदवाल , श्री मनीष कुमार, श्री आशीष पंथारी, श्री बलबीर राणा

कैम्प की तैयारी

मैंने 28-11-2008 को आफिस से छुट्टी ले ली थी | सारा दिन अपनी श्रीमती जी के साथ घर के काम-काज निपटाने के बाद मैंने रास्ते के लिए थोड़ा भोजन बनाने की तैयारी की | आलू उबाल के जख्या में छौंक लगा कर मैंने आलू के गुटके बनाये | आलू के गुटको को छौंकने के साथ साथ मैंने गौं की लाल मिर्च भी तली (भुन्टी मर्च)| मैंने भी अपनी श्रीमती जी के साथ पूरिया बनाई व् सलाद भी बनाया |

यात्रा का शुभारम्भ

जैसा की पूर्वनिर्धारित था की सब शाम 7:30 पर कश्मीरी गेट बस अड्डे पर एकत्रित होंगे | गाड़ी सभी को लेकर वही से जायेगी | सबसे पहले हमारे बीनू भाई जी शाम 7:00 बजे कश्मीरी गेट बस अड्डे पर पहुचे ,फिर विपिन भाई जी व् सुशील सेंद्वाल फिर मैं भी 7:15 पर पहुच गया | अब इंतजार था हमारे यंग उत्तराखंड की महान हस्ती महान लेट-लतीफ श्री श्री 108 पुर्नेंदु चौहान जी का , तो वो भी अपनी श्रीमती जी (श्रीमती पूनम चौहान जी ) व साथ में हमारे होने वाले भावी C.A साहब श्री मनीष कुमार जी के साथ ठीक 8:00 बजे पहुचे | वैसे तो ड्राइवर भी गाड़ी लेकर 8:10 पर आया था इसलिए साहब जी को बचने और बोलने का अच्छा मौका मिल गया था | इनकी प्रतीक्षा करते करते हम सभी के गले सूख गए थे सो हमने एक दो लीटर की कोक की बोतल ली और अपनी प्यास बुझाई | आप सब जानते हो दोस्तों , क्योंकि ये दिल मांगे मोर |

अब चली गाड़ी जिसमे सवार थे बीनू भाई जी और सुशील सेंद्वाल जी सबसे आगे ड्राइवर के साथ | बीच में हमारे साहब जी और मेमसाहब जी | पीछे की सीट पर हम बेचारे -हालात के मारे विपिन भाई और मैं |दिल्ली से चलने से पहले हमें गाड़ी में डीजल भरवाया फिर आशीष पंथारी जी ने हमें मोहननगर के गाजियाबाद -मेरठ रोड के मोड़ पर मिलना था सो हमने उनको वहा से 9:30 पर पिकप कर लिया | बेचारे पंथारी जी हमारा इंतजार वहा पर पिछले दो घंटे से कर रहे थे |

रास्ते में पहाड़ी गानों का आनंद लेते हुए हमने मुजफ्फर नगर तक का सफर काटा | मुजफ्फर नगर में हमने खाना खाया | जैसा की मैंने पहले बता की मैं भी घर से थोड़ा खाना लाया था और पुर्नेंदु भाई जी भी घर से मेथी के मजेदार परोंठे और नमकीन लाये थे सो हम सभी ने कुछ और खाने का आर्डर दे कर वह सब खाना मिल कर खाया |खाना खाकर हम गाड़ी में बैठे और अपने गंतव्य की ओर चल पड़े |

रास्ते की कठिनाइया

अभी थोडी दूर ही सफर तय किया था की मंगलौर के पास उत्तरांचल-उत्तरप्रदेश के बॉर्डर पर हम जाम में फँस गए | हमारे साथ कुछ इसे महानुभाव भी थे जिनको यह पता ही नही चला की हम दो घंटे से जाम में फंसे पड़े हैं .............क्योंकि वो तो सोने में मस्त थे | करीब दो घंटे के इंतजार के बाद जैसे -तैसे जाम खुला तो हम फिर अपनी आगे की शेष यात्रा को पुरा करने हेतु निकल पड़े | मेरी धर्मपत्नी जी ने जो कम्बल मुझे सर्दी से बचने के लिए दिया था वो भी मौकापरस्त लोगे ने मुझसे हथिया लिया और मैं पूरे रास्ते सर्दी से कांपता रहा जैसे कोई भीगी बिल्ली हो |

देवभूमि उत्तराखंड में हमारा प्रवेश

खैर , हम सभी 3:15 सुबह दिनांक 29-11-2008 को ऋषिकेश पहुच गए | यहाँ पर ठण्ड वास्तव में अनुमान के मुताबिक कही ज्यादा थी | कुछ सोने वाले सह-यात्रियों को अभी भी यह मालूम नही था कि देवभूमि उत्तरांचल, ऋषिकेश में पदार्पण कर चुके हैं | जैसे -तैसे उनको चाय पीने के लिए जगाया गया पर नीद तो जैसे उन पर हावी हो रखी हो..भगवान जाने कितना सोते है ये लोग ? सुबह की चाय की चुस्कियों का आनंद लिया थोड़ा फ्रेश हुए तब फिर हम चल पड़े अपने कर्मपथ पर |

ऋषिकेश से ३:३० पर चलने के बाद चंद्रभागा नदी पर बने पुल को पार करके हम प्रकृति के असीम सौन्दर्य पहाडो पर यात्रा का आनंद लेने लगे | कुछ दुरी तय करने के बाद हम श्री भद्रकाली मन्दिर के पास उत्तरांचल पुलिस के बने जाँच चौकी पर पहुचे वहा सभी वाहन रुके हुए थे क्यूंकि सुबह पॉँच बजे से पहले कोई भी वाहन सुरक्षा कारणों से इस जाँच चौकी से नही पार हो सकता |

अब मैं और पुर्नेंदु भाई जी और मैं गाड़ी से उतर कर चौकी अधिकारी के पास गए और उनसे निवेदन किया हम दिल्ली से आये है और हमारी संस्था यंग उत्तराखंड को ओर से हम प्रतापनगर में फ्री मेडिकल कैम्प का आयोजन करवा रहे है और उनको यह अवगत करवाया की हमारा सुबह ८ बजे प्रतापनगर पहुचना बहुत आवश्यक है | जांच अधिकारी बहुत भला आदमी था हमारी बातो को उन्होंने समझा और गंभीरता से निर्णय लेकर हमारी जाँच कर हमें जाँचचौकी पार करने का मौका दिया | वैसे भी स्पेशल डयूटी वाले हमारे पुर्नेंदु भाई जी हमारे साथ थे तो हमें किस बात का डर था |

अब हम ५.१० पर चम्बा के नजदीक सेलुपनी पहुच गए | ठण्ड के मारे सभी का बुरा हाल था , सेलुपनी पहुच कर अब हमारे अध्यक्ष महोदय जी को जंगल जाने (पेट खाली करने) की सूझी | वहा के लोगो ने बताया की आजकल यहाँ पर आदमखोर बाघ (मन्ख्या बाघ ) का आतंक है सो मैं, पंवार जी और पांथरी जी भी उनके साथ हो लिए (उनके अंगरक्षक बन कर) हमने सोचा की उनका अकेला जंगल जाना ठीक नही है | बड़ी मुश्किल से साहब जी का पेट खाली हुआ तो हम अब अपनी आगे की यात्रा को पूरा करने की लिए निकल पड़े |

अब हम ठीक ५.४५ पर चम्बा पहुच गए | चम्बा में एक और सदस्य श्री बलबीर राणा जी मेडिकल कैम्प में जाने हेतु हमारी प्रतीक्षा बस अड्डे पर कर रहे थे | हमने उनको अपने साथ लिया और हम अब निकल पड़े |
रस्ते में जगह जगह सड़क टूटी हुई थी, सड़कों में बड़े बड़े गड्ढे थे | मेरे, विपिन भाई जी और राणा जी के थिचोड़- थिचोड़ (उछल-उछल) के बुरे हाल हो गए थे |

भोर हो चुकी थी , देवभूमि के प्राकृतिक सौन्दर्य की छटा चारो ओर बिखरी हुई थी | चिड़िया भी अपना प्रात:काल का गुंजन कर रही थी चारो ओर वातावरण में सुगन्धित महक बिखरी हुई थी जो की मन-मष्तिष्क में घर कर रही थी | ऐसा नजारा देख कर रास्ते के सारी थकान मनो उतर सी गई हो |

सहसा किसी सदस्य के खुरापाती दिमाग में एक आइडिया आया की हम टिहरी डैम के ऊपर बनी रोड से जायेगे, यदि हम इस रोड से जा पाते तो हमें करीब २५ किलोमीटर की यात्रा काम करनी पड़ती , लेकिन यहाँ पर मैं आप सभी को बताना चाहूँगा की टिहरी डैम के ऊपर बनी रोड से केवल तभी जा सकते है जब आप के पास किसी राजकीय अधिकारी या टिहरी डैम के किसी वरिष्ठ अधिकारी द्वारा जरी किया गया पास या आज्ञा पत्र हो | वो हमारे पास तो नही था ,हमारे पास तो थे बस एक स्पेशल डयूटी वाले ऑफिसर (हमारे पुर्नेंदु भाई ) जैसे कैसे कर उनको जगाया गया, वो सुरक्षा गार्ड के पास गए तो उसने पास न होने के आभाव में हमें वहा से नही जाने दिया | हमने फिर डैम के आसपास के कुछ नजरो को अपने कैमरे में कैद किया और निकल पड़े प्रतापनगर की ओर |

करीब ७.४५ पर हम पीपलडाली पहुचे | हमें कैम्प में देरी का अंदेशा सताने लगा सो हमें पीपलडाली में बिना जलपान किए आपनी यात्रा आगे बढाई | पीपलडाली का लगभग ५०० मीटर झुला-जीप-पुल पार करने के बाद हम टिहरी झील के दूसरी ओर आ गए | यहाँ से यह रोड़ धारकोट होते हुए प्रतापनगर को जाती है | यह मार्ग बहुत ही संकरा और दुर्गम है | पीपलडाली से १५ किलोमीटर सड़क ठीक ठाक है परन्तु उसके बाद तो जैसे सड़क नही खड़ीन्जा वाली सड़क आ गई हो | फिर क्या था शुरू हो गई हमारी थिचोडम थिचोडाई | जैसे तैसे हम अपना सफर करते हुए प्रतापनगर पहुचे |

हमारे साथ गए एस्कोर्ट हास्पिटल के चिकित्सक -दल के रहने व खाने पीने की व्यस्था धारकोट के एक होटल में की गई थी | धारकोट से प्रतापनगर गाड़ी से ३० मिनट का रास्ता है |

प्रतापनगर में टीम का आगमन

हम सुबह 10.15 बजे सभी विपिन जी के घर पहुचे | वहा से प्रतापनगर हास्पिटल करीब ५ किलीमीटर है ,यही पर मेडिकल कैम्प का आयोजन किया जाना तय था | टीम की रहने, खाने-पीने की व्यवस्था सब इन्ही के घर में थी | मैं यहाँ पर विपिन जी के सभी घर वालो का बहुत आभारी हूँ जिन्होंने ने हमें अपने बच्चो की तरह प्यार -दुलार व हमारा हर जरुरत का ख्याल रखा | विपिन पंवार जी की माताजी, पिताजी , बहिन व भुला की बुआरी ने (जो की ग्राम प्रधान है ) ने सबका बहुत ख्याल रखा | हमें ऐसा लगा जैसे हम अपने माता -पिता व भाई बहिनों के साथ अपने ही घर पर है | किसी भी टीम मैम्बर को किसी भी परेशानी का सामना नही करना पड़ा | विपिन जी के चचेरे भाई श्री राजपाल भाई जी और आशीष (जो की इस कोम्प के सबसे काम उम्र के कार्यकर्ता थे ) ने भी इस कैम्प में अपना हर सम्भव योगदान दिया | विपिन जी के समस्त परिवार वास्तव ने इस कैम्प को सफल बनाने में महतवपूर्ण भूमिका निभाई |

विपिन जी के घर पहुचने के बाद हम सभी फ्रेश हुए , तब तक रसोई से कोदे (मंडवा) की रोटी, हरी सब्जी , घी, और आलू के परोंठे परोस दिए गए | सभी ने बड़े चाव से खाया .....कैम्प में देर हो रही थी ....सबको जल्दी थी ....कुछ लोगो ने मुझे पूरा खाना भी नही खाने दिया .........खैर हम सड़क तक पैदल गए और अपनी गाड़ी में बैठ कर मेडिकल कैम्प के आयोजन स्थल को रवाना हो गए |

मेडिकल कैम्प में टीम का आगमन

हमारे साथ साथ एस्कोर्ट हास्पिटल का समस्त चिकित्सक दल भी पंहुचा | दिनांक २९-११-२००८ को कैम्प 11 बजे शुरू हुआ | वहा के स्थानीय कार्यकर्ताओ और प्रतापनगर हास्पिटल के स्टाफ ने कैम्प शुरू होने से पहले होने वाले सभी कार्य पूरे कर लिए थे |

स्वागत व शुभारम्भ

इस कैम्प के मुख्या अथिति ब्लाक प्रमुख श्री पूरनचंद रमोला जी ने जेयेष्ठ प्रमुख श्री राजेन्दर प्रशाद भट्ट , ग्राम प्रधान श्रीमती सीमा पंवार जी , प्रिंसिपल श्री सरोप सिंह पंवार जी, हमारे अध्यक्ष श्री पुर्नेंदु चौहान जी, डाक्टर पीयूष जैन जी व डाक्टर निशांत जी व अन्य यंग उत्तराखंड टीम की उपस्तिथि में अपने हाथो से रिब्बन काट कर तथा वैदिक मंत्रोच्चार व आरती वाचन कर मेडिकल कैम्प शुभारम्भ किया |

मेडिकल कैम्प में कार्यवाही

इसके बाद सब अपने अपने कामो में लग गए | श्रीमती पूनम चौहान जी व अशिशी पंथारी जी मरीजो का पंजीकरण का कार्य शुरू किया | वरिष्ठ चिकित्सक श्री पीयूष जैन जी ने अपने सहयोगी चिकित्सक श्री निशांत जी ने अलग अलग मरीजो की जाँच करनी शुरू की व उनकी समस्याओ को सुनकर उनका निदान किया | एस्कोर्ट हास्पिटल के प्रोग्राम ऑफिसर श्री संदीप गोदियाल जी ने इस मेडिकल कैम्प में सराहनीय योगदान दिया | भीतर के कमरों में कही मरीजो का ई. सी. जी. परीक्षण हो रहा था तो किसी कमरे में उनका इको- कार्डियो की जाँच हो रही थी | श्रीमती सौम्या व उनकी अन्य सहयोगी मरीजो का रक्तचाप नाप रही थी | रक्तचाप नाप के बाद सभी मरीज डाक्टर्स के पास अपना पर्चा ले कर जा रहे थे | डाक्टर की टेबल के समीप खड़े होकर मैंने, विपिन जी व बीनू भाई जी, पुर्नेंदु भाई ने मरीजो की पहाड़ी बोली को हिन्दी में डाक्टर्स को बता कर उनकी सहायता की |इस मेडिकल कैम्प में लगभग ३०० मरीजो की जाँच की गई तथा लाभान्वित हुए |

इस दिन हमने कैम्प का समापन लगभग सायं ४ बजे कर दिया | इसके बाद यंग उत्तराखंड कैम्प टीम ने पूर्वनिर्धारित कार्यक्रम के अनुसार हमारे सदस्य श्री धनी राम जोशी जी के गाव गए | उनसे मिल कर उन्हें सान्तवना व उनके मृतक परिजनों को श्रधान्जली दी व शोक संतप्त परिवार तथा जोशी जी को समझाया |

इसके बाद टीम लम्बगाव गई जहा हमने गाड़ी के लिए डीजल व रास्ते में हुए टायर के पंचर को ठीक करवाया |
वापिस आते समय हमने रास्ते में एक देसी मुर्गा पकड़ा जिसको हमने मांजफ गावं के एक होटल में बनवाया और उसको वही पर खाया | वहा से अब वापिस विपिन जी के घर को चले जहा पर हमारे रहने व खाने -पीने की व्यवस्था थी | रात का खाना खा कर हम सब सो गए |

मेडिकल कैम्प में कार्यवाही का अगला दिन

अगले दिन ३०-११-२००८ को सुबह तैयार हो कर हम सब फिर से प्रतापनगर चल पड़े | पहले दिन की भांति सब काम पूरा कर हम ने समापन समारोह का आयोजन किया | जिसमे विपिन पंवार जी ने एस्कोर्ट हास्पिटल के प्रमुख चिकित्सक श्री पीयूष जैन जी को स्मृति चिन्ह भेट कर उनका स्वागत किया व इस कैम्प के सफल आयोजन के लिए उनका हार्दिक धन्यवाद् किया | इसके बाद श्री विजय बुटोला जी ने के मुख्य अथिति ब्लाक प्रमुख श्री पूरनचंद रमोला जी को स्मृति चिन्ह भेट कर उनका स्वागत किया व इस कैम्प के सफल आयोजन के लिए उनका हार्दिक धन्यवाद् किया |



इसके बाद श्री विजय कुकरेती जी ने प्रिंसिपल श्री सरोप सिंह पंवार जी को स्मृति चिन्ह भेट कर उनका स्वागत किया व इस कैम्प के सफल आयोजन के लिए उनका हार्दिक धन्यवाद् किया |

इस दिन हमें कैम्प लगभग एक बजे संपन कर दिया | डाक्टर्स की टीम वापिस दिल्ली रवाना हो गई | अब हमारी टीम की मस्ती करने का समय था सो पहले हम प्रतापनगर के राजा श्री प्रताप शाह के असंरक्षित महल, कोर्ट व अन्य सांस्कृतिक धरोहरों को देखने गए |

एक सच्चे उत्तराखंड क्रन्तिकारी से मुलाकात

कोर्ट के बाहर हमें एक वृद्ध सज्जन मिले जिनका नाम बिशनपाल सिंह "उत्तराखंडी" था | इन्होने हमें बताया की सन १९५० से ये प्रथक उत्तराखंड के माग को लेकर इन्होने कई आन्दोलनों में भाग लिया कई बार जेल की यात्राये की | लेकिन हमें तब बहुत बुरा लगा की आज उनके दोनों गुर्दे खरब हो चुके है और कोई भी उनकी सुध लेने को तैयार नही है | उनसे हमरी टीम की लगभग आधे घंटे बातचीत हुई उन्होंने हमें बताया की जिस उत्तराखंड का सपना हमने देखा था ये वो नही था | आज जो सच्चे उत्तराखंडी क्रन्तिकारी है उनका कही कोई जिक्र नही है और उन्हें किसी भी प्रकार की कोई भी राजकीय सहायता नही प्राप्त हो रही है | ये बड़े दुःख की बात है |

दिल्ली वापसी का सफर

इसके बाद हमने वापिस दिल्ली के लिए कुछ किया | प्रतापनगर में चलते समय मेरे खुरापाती दिमाग में एक विचार आया की क्योँ न हम सब प्रतापनगर से धारकोट पैदल जंगल से ट्रेकिंग कर के जाए ? परन्तु कुछ आलसी सदस्यों ने मन कर दिया फिर केवल बीनू भाई, विपिन जी, मनीष जी, आशीष भाई और मै ही पैदल जंगल के दुर्गम रास्तो से होते हुए ९ किलोमीटर पैदल यात्रा कर डेढ़ घंटे में धारकोट पहुचे ,जहा बाकी आलसी सदस्य हमारा इंतजार कर रहे थे वो भी सोते हुए |

हम पीपल डाली के लिए रवाना हुए वही पर हमने मच्छी-भात खाया | यहाँ पर भी हमारे आलसी साथियों ने मुझे भरपेट खाना नही खाने दिया और मैंने होटल वाले को एक हाथ से दिए और दुसरे हाथ से मछली की बोटी को खा रहा था ....चलते चलते | अब तक शाम के ६ बज चुके थे |
अब हम चम्बा ८.०० बजे पहेचे ,वापसी में हमने चम्बा में जलपान किया और निकल पड़े | वापिस फिर से सेलुपानी में पुर्नेंदु भाई का पेट ख़राब हो गया शायद वो मछली भात ज्यादा खा गए थे सो फिर उनके साथ जाना पड़ा ,जंगल में | ऋषिकेश हम १०.०० बजे पहुचे | मुजफ्फरनगर हम करीब रात १२.३० बजे खाना खाया फिर वापिस दिल्ली को चल पड़े | हम सब सुबह ३ बजे दिल्ली पहुच चुके थे | उसके बाद ड्राइवर ने सभी को उनके घरो पर छोड़ा |

इस प्रकार इस मेडिकल कैम्प सफलता पूर्वक संपन्न हुआ | हम सभी ने समाज सेवा के साथ साथ इस कैम्प में भरपूर आनंद लिया | मेरे जीवन में यह यात्रा सदा एक यादगार रहेगी |
मैं यहाँ पर उन सभी व्यक्तियों का धन्यवाद प्रकट करता हूँ जिन्होंने इस सफलता पूर्वक संपन्न हुए कैम्प में अपना प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष रूप से अपना भरपूर योगदान दिया |


लेखक : विजय सिंह बुटोला
दिनांक 04-12-2008.

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