मेरा परिचय

My photo
Delhi, India
प्रिय उत्तरांचली मित्रो, आप सभी को मेरा आदर युक्त सादर सेवा भाविक नमस्कार,| मेरा नाम विजय सिंह बुटोला है | मैं मूल रूप से टिहरी गढ़वाल उत्तराखंड का निवासी हूँ | वर्तमान समय में मैं परिवार सहित दिल्ली में रहता हूँ | आज इन्टरनेट के मध्यम से हम सभी उत्तराखंडी एक दुसरे के साथ जुड़े हुए है तथा किसी न किसी रूप में उत्तराखंड की विभिन्न समाज सेवी संस्थाओ के द्वारा हम सभी वहा के जन-समुदाय के लिए अपने अपने सामर्थ अनुसार जुड़े हुए है | जिन्होंने अपने सतत प्रयासों द्वारा दुनिया भर में बसे उत्तराखंडियों को इंटरनेट के मध्यम से जोड़ा हुआ है , जहाँ हम सभी सफलतापूर्वक अपनी क्षमता और संसाधनों का विभिन्न रूपों में उत्तराखंड राज्य तथा उसके निवासियों के विकास के लिए उपयोग करते हैं |यह वास्तव में एक उत्कृष्ठ व सराहनीय प्रयास है| एक उत्तराखंडी होने के नाते मैं आप सभी से आशावान हूँ कि आपके दृढ-निश्चय और लगनशीलता से किए गए प्रयासों से ही हमारा उत्तराखंड निश्चय ही एक सम्रध व विकसित राज्य बन सकेगा |

Monday, December 19, 2016

एक दिन की बारात कु हाल




Sunday, March 3, 2013
एक दिन की बारात कु हाल


प्रिय मित्रो, सादर नमस्कार,
प्रस्तुत हास्य कविता मैंने उत्तरांचल में आज कल प्रचलित एक दिवसीय विवाह के होने के बारे में लिखी है

एक बार दगडियो
मैके भी दिन दिन की बारात माँ जाणा कु मौका मिली
चल दगडियो का संग मन प्रसन्न मुखुडी को रंग तब खिली
झटपट हवे गे वरनारायण तैयार
पैरी वें सूट बूट आर टांगी कमर माँ तलवार
सड़की माँ गाड़ी थाई खड़ी मारनी छाई होरण
ढोल दमौं मसकबिन संग बाजणा था रणसिंघा-तोरण
बारात पहुची सड़की माँ सबुन अपनी सीट खुजाई
वरनारायण कु मामा आर दही की परोठी घर छुटी गयाई
चली ग्ये बारात डांडी-कंठियो माँ होण च गाड़ी कु सुन्स्याट
सभी पौणा बन्या चन दारू माँ रंग मस्त करना चन खिक्लीयाट
बारात ज़रा रुकी बीच बाजार 
दरौल्या पहुची ठेका माँ रुपया लेकी हजार
चल पड़ी गाड़ी कुई छुटी गे होटल माँ कुई छुटी धार पोर
दरोलिया दिदो कु त छोऊ बस बोतली पर शोर
बारात पहुची चौक माँ होण लगी गे स्वागत
कुई बैठी कुर्शी माँ कुई बैठी दरी माँ अर कुई बैठी छत
जवान छोरा खोजना छन, गलेर नौनी कुजणी कख हर्ची गे
बोलना छन की अब नि राये वू रंगत जू पैली छाई
बैठी पौणा पंगत माँ खाई उन काचू भात
दाल माँ लोण भिन्डी ह्व्वे गे अब बोन क्या बात
कखी नि मिली पानी कखी नि मिली सौंफ-मिश्री
हे हिमाला की हव्वे यु हम सब संस्कार बिसरी
बामण दीदा न पढ़ी सटासट अपना मंत्र
ब्यौला का कंदुड़ माँ वैन बोली तब यन्त्र
फेरा फेरी सरासर ब्यौली च रेस लगाणी
ब्यौला दीदा पिछने रेगे, ब्यौली नी छौंपी जाणी
पैटी बारात ब्यौली अब नी जयादा रोंदी दिखेंदी
डोला माँ बैठी जे ब्यौली बव्वे बुबा सबी मनौंदी
यन राइ दिदो मेरु एक दिनी की बारात कु हाल
सब कुछ सरासर हौंदु यख यनु बणी गे कुमॉऊ-गढ़वाल
रचियेता: विजय सिंह बुटोला
दिनांक 16-10-2008

No comments: